चरनदास | Charandas

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Charandas by त्रिलोकीनारायण दीक्षित - Trilokinarayan Dikshit

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( ६ ) तंत्र-साहित्य में मक्ति के स्वरूप--वैदिक साहित्य के समान ही तंत्र साहित्य प्राचीन है। इस साहित्य मे शक्ति सिद्धान्तो का प्रतिपादन हूत्रा ई । इसमे सवशक्तिमान्‌ की च्राराघना पिताके सूप नहीं वरन्‌ माताके क्प में करने का उपदेश दिया गया । सक्तिमाग में इन ग्रन्थों का प्रचुर प्रभाव पड़ा । देवीसू को तो वैदिक सादित्य तक में स्थान प्राप्त हुआ । शैव सम्प्रदाय के सिद्धान्तो की स्वना तथा उद्भव इन्हीं अन्यों के आधार पर हुश्रा । वैष्णव सम्प्रदाय के पांचरात्र झागम इसी साहित्य के झ्न्तगंत परिगणित होते हैं । तंत्र-साहित्य में भक्ति का बड़ा तीन्र, उज्ज्वल तथा महत्वपूण रूप व्यक्त हुश्रा है ! इस साहित्य में भक्त के चरित्र, साघना पद्धति तथा प्माचार-विचार कामी सबिस्तार उल्लेख मिलता है । तंत्रसाधना में भक्ति का स्वरूप बड़ा स्पष्ट है । | पांचरात्र--षात्वतों से लेकर गुप्त सम्रायं के उक्कर्षकाल में वैष्णव घमं तथा भागवत घमं का श्रम्युद्य हन्ना । गुप्त सम्रारों ने वैष्णव घमं को ाष्टरूघमं के पद्‌ पर प्रतिष्ठित किया । इसी समय पांचरा् संहिता का प्रणयन हूश्रा । ब्रह्म के भक्तों को भागवत कहा गया श्रौर इसी कारण यह घमं भागवत घम के नाम से प्रख्यात हुआ | भागवत घमं ही पांचराक्रमत के नाम से प्रसिद्ध है । इसका सात्वत-मत नाम भी है । यह अंतिम नाम इसलिये प्रसिद्ध हुआ कि सात्वत नरेशों ने इस मत के प्रचार में विशेष उद्योग किया था । पांचरात्र शब्द का निर्माण पांच तथा रात्र शब्दों से हुआ है।रात्र शब्द ज्ञान का पर्दा है। पांचरात्र साहित्य में परमतत्व सुक्तियोग तथा सत्संग की विवेचना की गह है| चारों वेद तथा योग के सिद्धान्तों का निरूपण होने के कारण भी यह साहित्य पांचरात्र के नाम से प्रख्यात हुआ *-- इदं महोपनिषदं तेन पंचरात्रान्नुशाब्दितिम्‌ । नारायरश्रखोद्गीतं नारद श्रावयत्‌ पुनः ॥ -महा०, शांति पर्व॑, श्रध्याय ३३६ प्रस्तुत तंत्र अ्तीव श्रवांचीन एवं बहुदेबोपासना का समर्थक है । पांचरात्र साहित्य क श्रनुसार पंच व्यापायें के माध्यम से मक्त भगवान को प्रसन्न करता है :-- ( क ) आआयंगमनकाय- काया, वाक्‌ एवं मन च्रवहित करके देवग्रह ऊ लिए प्रस्थान (ख ) उपादान--पूजा द्रव्य-झज॑न था संग्रह (ग ) इञ्या-पूजा ( घ ) स्वाध्याय--मन्त्रों का जग; दाशनिक अन्थों का संग्रह, अवलोकन ( ङ ) योग--ध्यान




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