विचार - पोथी | Vichar - Pothi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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विचारपोथी १३ ८ भगवान्‌ ने' हमारी श्रांखोंका रंग भी भ्राकाश के समान नीला बनाया है। नीलकान्तका दान ही उसका उद्देश्य रहा होगा। € कमल याने अ्रलिप्त पवित्रता । प७ भक्त नगम्र होता है। उसको भगवानक चरखाका दर्शन पर्याप्त जान पड़ता है । भर दिनभर काम करनेवालेके लिए रातकी नींद जितनी आआवदयक श्रौर शभ्रानन्दकारक है उतनी ही जीवनभर मेहनत करनेवालेके लिए श्रन्तिम महानिद्रा आवश्यक श्रौर ऑ्रानन्द- कारक है । मृत्यु भगवानका सौम्यतम रूप है । २ संस्कृत में 'हनू' याने मारना श्रौर 'हन्‌' याने गुणना है। हिंसासे पापका गुृणाकार होता है । के देवाठीं पावुनि जन्म झोंगठीं । त्रासला चिठसला जीव श्रंतरीं ॥। राहिलों निराठा म्हरुनी तेथुनी । सवित्याचें मंगल किरण सेवुनो ॥। मी श्रलिप्ततेचें गाणें गा तसें । गा गा रे सखया तूं ही गातसें ॥ पड घेऊनी वामनरूप भूग तो। येतसे लुटाया मजला धांवुनी ॥। परि ह्ृदयाचें बलिदान देउनी। जिंकिला कोंडिला केला गुंग' तो '॥




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