टीपू सुलतान | Tipu Sulatan

1010/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Book Image : टीपू सुलतान  - Tipu Sulatan
[adinserter block="2"]

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about आचार्य चतुरसेन शास्त्री - Acharya Chatursen Shastri

Add Infomation AboutAcharya Chatursen Shastri

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
माँगी गई 1 डच लोग ता सीधे-सात सौदागर थे । उन यडाई चगडे में फंसन से साफ इनकार कर दिया । परतु फ्रेचो ने जवाव दिया. “यदि नग्रेजी शेर प्राणा स यहुत हा भय भोत हो रह हैं तो वे फौरन ही बिना डिसी रोक-टोक के चदननगर मे टमारा आश्रय तें। आधिता यी प्राण रक्षा के लिए फ्रासीसी बीर सिपाहा नपन प्राण देन में तनिप भी कातर न हाग। इस उत्तर से भप्रेन जज्जित हुए, नौर जीये । बतवत्ता से ढाइ पोस पर गगा के क्निर एटाय का एक पुराना बिता था । 50 सिपाही उसमे रहते बा बह वभी किसी पाम न आता था । अग्रेजा ने दो कर उस पर हेमा कर दिया । वचार सिपाटी भाग गय । उनकी तोप ताइ फोइकर जप्रेचा न गंगा से यहा दी जौर वडे गौरव स अपनी विजय प्रतारा उस पर फहूरा दी । नागा न समय लिया, वस, अब नप्रेजां वी खर सही ह। नवाय यह उददण्डता न सहत करगा । दूसरे दिन 2000 नवावी सिपाही बिन व सामने पहुंच ही थे कि जग्रेज अफसर लडजा को बही छा वित सभागन लग । भागते जहाजा पर तडातड गोले बरसन लगे । भग्रेज अपना गाला-वारूद नप्ट कर, और अपनी पण्डी उधाड, क्लक्त लौट आय । यहाँ जाकर, उदडीन इप्णवल्लभ, जो राजवल्लभ वा पुश्न था, जौर सॉगकर विद्रौह व नयराध में अग्रेजा वी शरण आ रहा था, उस इस डर सवेद कर लिया कि रही यह क्षमा मागकर नवाव से न मिल जाय । जमीचद कनक्ते का प्रमुख व्यापारी था । सठा म जैसी प्रतिप्ठा जगतमठ वी थी, व्यापारिया म बही दर्जा अमीचद का था । यह व्यक्ति भारतवप दे पश्चिनी प्रदेग का बनिया था ! अग्रेजो न उसी वी सहायता सम वगाल सम वाणिज्य पिस्तार वा सुभीता पाया था। उसी की साफत अग्रेज गॉव-गाँव रुपया वॉटकर कपास तथा रेशमी वस्न की खरीद से खब र्पया पा कर सके थ। उसकी सहायता न होती, तो अप्रेंज लोगा को जपरिचितत दश मे उपनी शविंत यढाने जौर प्रतिष्ठा प्राप्त करन का मीठा वदापि न मिलता । केवल व्यापारी कहन ही से अमीचाद का परिचय नहीं मिल सकता । टीपू सुलतान / 15




User Reviews

  • Prashant

    at 2026-06-15 06:57:54
    Rated : 10 out of 10 stars.
    इतिहास की जो तथ्यात्मक जानकारी आचार्य चतुरसेन शास्त्री और आचार्य वृंदावन लाल वर्मा जी के उपन्यासों और साथ ही साथ जयशंकर प्रसाद जी के नाटकों में मिलती है वह किसी भी ऐतिहासिक पुस्तक से बढ़कर और दुलारथ जानकारी है
Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now