दो | Do

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Do by गिरिराज किशोर - Giriraj Kishor

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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पूजा खत्म करने से पहले वह घंटी वजा-बजाकर जोर-जोर से शरारती गाने लगा । उसकी श्रावाज झारती गाने के साथ-साथ उयादा युलन्द होती गई । वह किसी श्रौर शोर को जीतने की कोशिश करता हुमा-सा मालूम पड़ने लगा । नीमा उठकर अन्दर चली गई । श्रारती उसका पहला श्रादमी भी काफी गा-गाकर श्रौर ज़ोर-जोर से करता था । बह उसका पेशा था । कई चार ऐसा भी होता था कि ब्रारती के ठीक वाद ही वह उसे परेशान करने लगता था । वहाँ भी नीमा ने एक तुलसी का विरवा लगा रखा था । पूजा करने के वाद जब उसका पहला शभ्रादमी उस विरवे से तुलसीदल लेता था तो लगता था वह काँप रहा है । तुलसीदल पीले पड़-पडकर कर रहे है । यह वैसा नही है । झ्राज ही जोर-जोर से वोलकर भारती कर रहा है । पूजा के बाद यह झ्ौर उयादा चुप हो जाता है । इसने कभी तंग नहीं किया । उम्र भी ज्यादा है । श्रपनी बात उतनी जोर से नही कह पाता । रात वाली थाली एक दूसरी थाली से ढकी रसोई के बीचो-बीच उसी तरह रखी थी । नीमा खड़ी उसे देखती रही । एक तरफ सरका दे या इसी तरह रखी रहने दे ? उसने थाली को उसी तरह रहने दिया । त्रही खडी-खड़ी दोबारा दाल बीनने लगी । वह बाहर जानें वाला कुर्ता पहनता हुम्ना श्रन्दर से आ्राया । नीमा ने कनखी भाँखों से उमे श्राते हुए देखा । वह जूते पहन चुका था । रसोई के बाहर से ही पूछा, “जलेवी ले झाऊँ ?' उसके मुंह में तम्बाकू था। वह चुप रही । उसने जवाब का इन्तज़ार किया । जवाब नहीं मिला तो उसने फिर कहा, 'थैला उठा दो । श्राधा सेर ले झाता हूँ । रात तुम भूखी सो गई थी ।' नीमा नें मुंह की पीक को रोककर वलवल करते हुए कहा, 'मेरा तो वरत है । *किस वात का वरत ? क्या श्राज भी तुम रात की तरह भूखी रहोगी ? भूखा रहना या भूखा रखना दौनो ही बुरी चात है । सब कुछ होते हुए भी भूखी रहो तो होने का क्या लाभ ! चह उसी तरह दाल वीनती हुई वोली, “बहुत दिन से संतोपी माता दो / ११




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