परिशिष्ट | Parishisht

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Parishisht  by गिरिराज किशोर - Giriraj Kishor

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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बावनराम अपनी फैक्ट्री के इस्जी नियरों से मशवरा करते घूमे थे कि वह कसे अनुकूल को आई. आई. टी. में भर्ती करायें । वे उसी आई. आई. टी. में उसकी भर्ती चाहते थे जो उसके प्रदेश की सरहद के पार थी। चार-छः घण्टे का सफर और अनुकूल के पास । <.पने फोरमैन कै माध्यम से वे एक नये-नये भये इन्जीनियरसे जा टकराये थे । उसमे भौ बही से वी. टेक. करिया था ! उसकी सूचना ने बावनराम को आह्लादित कर दिया ! उसे लगा कि यह्‌ सव ईश्वरने अनुकूल के लिए ही किया है। अगर ऐसा न' होता तो इसी साल यह छूट क्यो हुई होती ? सरकार ने दसी सालं अनुमूचित जाति के छात्रीं को चिना किसी सामूहिक टेस्ट लिये दाखिल करने का निर्णय लिया था । यह सब दिल्‍ली से ही नियोजित होने की वात थी ! उसी वक्त से बावनराम आश्वस्त हो गये थे कि अनुकूल वहाँ जगह पा जायेगा । उसका रास्ता देश-विदेश सब जगह के लिए खुल जायेगा । वे अपने बेटे को हवाई जहाजों पर उडते ओर कारों मे घूमते देखने लगे थे। वावनराम को यह्‌ भी पता चल गया था कि इन मटेती सस्याओमे इस वपं का दाखला इसलिए सहज होगा षयोकि इसका भभी अधिक प्रचारनहीहो सकाहै) क्रिसी भी प्रभावशाली ससद सदस्य को पकड लेने से काम चल सकता है। अनुकूल के लिए इससे अच्छा अवसर बावनराम को दूसरा नजर नहीं आाया। उस इन्जीनियर ने उनको यह भी बता दिया था कि यदि इस वार चूक गये तो वेटे को आई. आई. टी. में दाखला दिलाने की बात दिल से मिंकाल दे । उसके लिए आयोजित होनेवाली सयुक्‍्त परीक्षा मे बडे-बड़े सूरमा उलट जाते है । उनके फोरमेन ने हंसकर चिपकाया था कि बावनवाबरू, यह्‌ काम ज्ञान-पथ पर चलकर नही होता । धक्रिति-पथ अपनाभो। जा सको तो उसी पर टहुलते चले जाओ, मकरन्द पा जाओगे । इस वात पर सब हेंसे पड़े थे । अनुकूल थोडा असमंजस में पड़ गया था। चूँकि बावनराम स्वय एक छोटे-मोटे नेता थे और किसी-न-किसी रूप मे अपनी विरादरी के दोटो के पुरोधा कहे जाते थे, इसलिए उनकी पहुंच क्षेत्र के ससद-सदस्य तक थी । बावनराम के लिए उन्ही के पास जाना आसान था । लेकिन उनके पास जाने से पहले बावनराम के रास्ते मे कई खाइयाँ थी जो लॉधघी जानी शेष थी । पत्नी को तैयार करना, बेटियों और दामादों की नाराजगी का सामनां करना और ` पमे का प्रबन्ध । पत्नी का तो जो कहना था सो था ही । दामादों ने सस्त रुख अपना लिया था ! आखिर अनुकूल मे ही ऐसी क्या बात है कि सबकुछ उसी पर लुटा दिया जायेगा । क्या घाबू वाकी सब लोगों से अपना ब्यौहार खत्म कर देना चाहते है? न रिश्तेदारों से रिष्तेदारी भौर न व्यौदारि्यौं मे व्यौहार ! अगर चाहते हैं तो कह दें। रहे अकेने । आगे का भी तो दखना है। कल को झनुकूल इन्जीनियर हो गया तो क्या अपनी बेपढी बहनों और बहनोइयों को घास डालेगा ? हवा-ही-हवा में उडेगा । अभी बोलने-वत्तियाने मे मृंह्‌ दुखता है । अगर उसे किसी काम को रखना है तो जितना पढ गयां वही वहुत है । घर वसायेगा और काम से लगेगा तो मा-्वाप को भी कुछ आराम मिलेगा । सारी जिन्दगी हो गयी हाड गलाते 1 माँ-बाप वो बेटे से परिशिष्ट / 17




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