पंडित जी | pandit ji

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pandit ji  by नाथूराम प्रेमी - Nathuram Premi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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९६ पण्डितजी है इसीलिए. इन्दोने सव कृन्छनान चूझकर .हमें नीचा दिखानेके “लिए. यह काशल रचा हैं]! _. . भः, काटकी मूरतके समान खडी ह -कुखम अपनी जँखिोसे ओ. पोछने टगी 1 वह वदी अभिमानिनी है, पर इस सभय कहः केटी है, क्या करे ? चरन्दावनकी र्मी तो उठकर अन्द्र-कोठरीमे जाकर ठ्ड़कोके साथ बातचीत करने लंगी; पर, उसके लड़केके नेत्र कोठरीके बाहर इघर उधर भटक रहे थे । एकाएक,वे एसोद्ररमें खडी हृईः ऊुश्वुमपर जाकर ठहर गये । जब आँखे चार हुई, तब इन्दावनने समझा कि द्यायद. वद्द संकेतसे अपने पास बुला रही है । पल-भरके. लिए. उनका साग इत्पिड उन्मत्तकी भौंति उछलकर फिर स्थिर हो गया । उन्होने सोचा कि यह असंम्भव है, यह मेरी अँखोकी भूल है। चृन्दावन ' सोचने लगे. कि-संयोगवंदा कभी सामना हदो जानेपर जौ धट खचकर 'जल्दीते खामनेसे ची जाती है, मेरे प्रति जिसकी निदारुणःअरुचिकी वात अनेक वार कुजनाथ सुना चुक्रा है, वह क्या सुझे कभी अपनी इच्छासे अपने पास वुखावेमी १ यद कमी हो ही नदीं सकता । चन्दावनने अपनी ट्ट दूसरी ओर फेर टी }1पर वह वरदौ भी ठद्दर न सकी । जिस जगह अँखिं चार दुई थी, फिर्‌ उसी ओर चली गई | ठोक बात है, कुचम' उन्दींकी ओर देख रदी ६ । उसने उन्हें हाथके सकेतसे घुलाया । लट्खडाते हुए पैरोंसे बृन्दावनने रसोईघरके दरवाजेके पास आकर कोमल स्वग्से पूछा- सुझे घुलाया है ? कुसुमने भी उसी प्रकार कोमर स्वरसे कटा-दै । दन्दावनने और' भी खिसककर पूछा--क्यों ! कुतुमने थोड़ी देर तक चुप रहकर भारी गलेसे कद्दा--म तुमसे यद्द पूछती हूँ कि दमार जले दीन दुखियोंको इस प्रकार सतानेमें तुम्दारे जैसे बडे आादमियोकी कान-सी वद्दादुरी है? ह | सदसा यद कैसा अभियोग ! दन्दावन चुपचाप खड़े रहे । कुसुमने और अधिक कठोर भावते कद्दा --क्या ठम जानते नहीं हो कि दम लोग किस प्रकार अपने दिन ब्रितातें हैं ? तब क्यों मदयासे ऐसी हंसी की £ क्यों इतने आदमियोंको लेकर खानेके लिए. भावे ? पहले तो इन्दावनकी समझमें ही, न आया कि इस उढटनेफा क्या उत्तर दूँ हैं... हू.




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