धर्मामृत (अनगार ) | Dharmamrit (Anagar)

55/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Book Image : धर्मामृत (अनगार ) - Dharmamrit (Anagar)
[adinserter block="2"]

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about कैलाशचंद्र शास्त्री - Kailashchandra Shastri

Add Infomation AboutKailashchandra Shastri

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
प्रस्तावना १५क्रमकथयनेन यतः प्रोत्सहमानोऽतिदूरमपि शिष्यः! अपदेऽपि संपरतृ्तः प्रतारितो मवति तेन दुर्मतिना ॥१९॥जो अल्पमति उपदेशक मुनिषर्मको न कहकर धावकधर्मक उपदेह देता है उसको जिनागममें दण्डका पात्र कहा है । क्योंकि उस दु्बुद्धिके क्रमका भंग करके उपदेश देनेसे अत्यन्त दूर तक उत्साहित हुमा भी शिष्य श्रौता नुच्छ स्थानमे ही सन्तुष्ट होकर ठटगाया जाता ह । अतः वक्ताको प्रथम मुनिधर्मका उपदेश करना चाहिये, ऐसा पुराना विधान था ।इससे अन्वेषक विद्वानोके इस कथनमें कि जैन घर्म और बोद्धघ्म मूलतः साधुमार्गी धर्म थे यथा्थता प्रतीत होती है ।लोकमान्य तिलकने अपने गीता रहस्यमे लिखा है कि वेदसंहिता और ब्राह्मणों में संन्यास आश्रम आवश्यक नहीं कहा गया । उलटा जमिनिने बेदोका यही स्पष्ट मत बतलाया है कि गृहस्थाश्रममें रहनेसे ही मोक्ष मिलता है । उन्होंने यह भी लिखा है कि जन ओौर बौद्धधभके प्रवर्तकोने इस मतका विशेष प्रचार किया कि संसारका त्याग किये बिना मोक्ष नही मिलता । यद्यपि शंकराचार्यने जेन ओर बौद्धोका खण्डन किया तथापि जन भौर बौद्धोने जिस संन्यासपर्मका विशेष प्रचार किया था, उसे हो श्रौतस्मार्त संन्यास कहकर कायम रखा ।कृ विदेनी विद्वानोका जिनमे डा० जेकोवी' का नाम उल्लेखनीय है यह मत हैं कि जैन भर बौद्ध श्रमणोके नियम ब्राह्मणघर्मके चतुर्थ आश्रमके नियमोंकी ही अनुकृति हैं 1किन्तु एतरेश्षीय विद्वानोका एेसा मत नह है क्योकि प्राचीन उपनिषदोमे दो या तीन ही आश्वमोका निर्देश मिलता है । छान्दोग्य उपनिषदे अनुसार गृहस्या्षमसे ही मुक्ति प्राप्त हो सक्तो ह । शतपथ ब्राह्यणमे गृहस्थाश्रमकी प्रलमा है भौर तैँत्तिरीयोपनिषद्में भी सन्तान उत्पन्न करनेपर ही जोर दिया है । गोतम धर्मं- सुत्र ( ८1८ ) में एक प्राचीन आचार्थका मत दिया है कि वेदोको तो एक गृहस्थाश्रम ही मान्य है । वेदमें उमीका विधान ह अन्य माश्रमोका नही । वाल्मीकि रामायणमे संन्यासीके दर्शन नहीं होते । वानप्रस्थ हो दृष्टिगोचर होते है 1 महाभारतमे जव युधिष्ठिर महायुद्धके पश्चात्‌ सन्यास लेना चाहते है तद भीम कहता है- शास्म किला हँ कि जब मनुष्य संकटमें हो, या वृद्ध हो गया हो, या शत्रुओसे त्रस्त हो तब उसे सन्यास ठेना चाहिए । भाग्यहीन नास्तिकोंने ही संन्यास चलाया है ।अतः विद्वानोका मत है. कि वानप्रस्थ और संन्यासको वैदिक भायोनि अवैदिक संस्कृतिसे लिया है ( हिन्दूषमं समीक्षा पृ १२७ } अस्तु,जहाँ तक जेन साहित्यके पर्यालोचनका प्रदइन है उससे तो यही प्रतीत होता है कि प्राचीन समयमें एक मात्र अनयार या मुनिधमंका ही प्राघान्य था, श्रावक घम्म आनुष॑ंगिक था । जब मुनिधर्मको घारण करने- की ओर अभिरुचि कम हुई तब श्रावक धर्मका विस्तार अवश्य हुआ विन्तु मुनि घर्मका महत्त्व कभी भी कम नहीं हुआ, क्योकि परमपुरुषार्थ सोक्षकी प्राप्ति मुनिधर्मके बिना नहीं हो सकती । यह्‌ सिद्धान्त जेन धर्ममें आज तक मी अक्षुण्ण हैं । ५. घामिक साहित्यका अनुशीलनहमने ऊपर जो तथ्य प्रकाशित किया है उपलब्ध जैन साहित्यके अनुशी लनसे मो उसीका समर्थनहोता है । सबसे प्रथम हम आचार्य कुन्दकुन्दको लेते है । उनके प्रवचनसार और नियमसारमें जो आचार विषयक चर्चा है वह सब केवल अनगार धर्मसे हो सम्बद्ध है । प्रवचनसारका तीसरा अन्तिम अधिकारसे, वु ई, जिल्द २० को मस्तावना टू, १२




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now