युधिष्ठिर | Yudhishthir

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Yudhishthir by कृष्णगोपाल माथुर - Krishna Gopal Mathur

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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दूसरा अध्याय १३ वहाँ जाकर उन्होंने देखा कि कपड़ों का एक सुंदर नगर-सा बना हुआ है । जगह-जगह फ़ौवारे चल रहे हैं, और सुंदर पूल-बागर वने हुए है । यह हर्य देखकर पांडवों को बड़ा आनंद हुआ | थोडी देर सैर करने के वाद्‌ युधिष्ठिर सब भाइयों के साथ भोजन करने बेठे । उनके साथ कौरव मी जीमने बैठे । भोजन में अनेक प्रकार की चीजें बनाइ गई थीं । उनका स्वाद्‌ ले-लेकर वे लोग आपस में ,खूब प्रशंसा करने लगे । जिसे जो चीज़ अच्छी लगती, बह दूसरे को दे देता था । इस तरह देन- लेन ए दु दुर्योधन ने विष-मिली भिखाई भीमसेन को दे दी। सीस को दुर्योधन पर किसी प्रकार का संदेह तो था ही नहीं, उन्होंने वह मिठाई बड़े शौक से खा ली। यह देख दुर्योधन सन-ही-मन खूब प्रसन्न हुआ । उसने समझा कि मेरा मतलब सिद्ध हो गया है। अस्वु, भोजन हो जाने पर कौरवों ओर पांडवों ने सिलकर बड़े आनंद से जल-बिहार किया । जल का खेल खेलते-खेलते संध्या हो गद। सबने जल से निकल-निकलकर अपने कपड़े आर गहने पहने । परंतु जहर के प्रभाव से भीमसेन गंगा के किनारे ही बेहोश होकर पड़ रहे । उनको किसी प्रकार की सुघबुधघ न रही । यह बात और कोड नहीं देख पाया, सिफ़ें दुर्योधन दही जानता था । जब उसने देखा कि भीमसेन बिलकुल होश में नहीं हैं, तो वह उनके पास गया और हाथ-पाँव बाँधकर उन्हें गंगा में डुबो आया | _ बांगा के सीतर-ही-भीतर सीमसेन नागलोक में पहुँचे । वहाँ सर्प




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