योजना | Yojana

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्रारम्भ च्‌ तो में ऐसी तालीम दूं कि वे बचपनसे ही तूफान नहीं करना विध्वंस नदीं करना, यह सीखें । लेकिन जो कुं करे वह सृजना- त्मक हो, इसी में कला है । . में यह नहीं मानता कि ववे जन्मसे श्रच्छैया बुरे दोते हैं । . हाँ; स्वाभावमें तो जरूर कुछ भिन्न होते दै, लेकिन उसे तो हम ठीक करेंगे ! इससे ज्ञात होता है कि जब बच्चा माँ के पेटमें आता है तभीसे.उसकी तालीम शुरू दोती है। इसी पर प्रौढ रिक्ता खड़ी दै । प्रौदोंके संस्कार बच्चों पर पढ़ते हैं । बच्चेका संस्कार भी वहींसे शुरू होता है । बच्चेके हाथ 'पैर हरदम दिलते डुलते रहते हैं रौर समय पर वहं श्रपनेसे छुक न कुछ करता रहता है । उसे यह्‌ पता नहीं होता छि वह क्या कर रहा है लेकिन उसकी हरेक क्रिया रचनात्मक रहती ह, विष्वं सक नहीं । दो-ढाई सालके वच्चे हमारे हाथमे श्रावे ओर अपने हाथ पोवि हमारे बताए रास्तेसे इस्तेमाल करें तो ये कहाँ तक जायेंगे, मे उसकी हृद नहीं बाँध सकता । उन्हें मारकर नहीं, बल्कि प्रेम से ही सिखाना है । सिखानेकी मेरी पद्धति तो यह ्ोगी फर पहले रंगोकी पद्‌- चान कराकर चित्रे शुरू करे 1 अन्तर भी तो चित्र ही होते हैं । कोई तोतेका चित्र बनाएगा, कोई सूतका, ओर कोई अक्तरका । इस प्रकार सबके अलग-अलग चित्र होगे। लिखना चित्र हार शुरू किया जाय । १,२, अलीफः वे, य, श्रा जादि चित्र रूपम सिखाया जाये । जव वे अक्षर चिच्र रूपमे सीखंगे तो अरलगसे उन्द सिखाने की झावश्यकता नददीं होगी । पहले थे या १ का चित्र सीखें, - सव अन्तर चिन्नमय हो जायें, तब उनका क्ञान दिया जाय । “थी मास नादमें श्यावेंगे । आजकी तरदद “थी श्ञासे” नहीं सिखाए




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