एक धर्मयुद्ध | Ek Dharmayuddha

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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१, मजदूरों के घर-घर जाकर उनकी समूंची हालत के बारे में पूछताछ करने, उनकी रहन-सहन में कोई कभी हो तो उसे सुधारने, संकट में उन्हें सहायता और सलाह देने, तथा उनके युख-दुःख मेँ भरसक हाथ बैँटाने की कोदिश करना । ” २. लड़ाई के दरम्यान अपने रुख और रवैये के बारे में मजदूरों को कुछ सलाह-सूचना श्राप्त करनी हो, तो उसका ऐसा प्रबन्ध करना जिससे वह उन्हें तुरत श्राप्त हो सके । ३. रोज़ एक नियत स्थान पर मजदूरों की आम-सभा करके उनको लड़ाई के सिद्रान्त भौर उसका रहस्य समक्षाना । ४. सज़दूरों के लिए रोज़ * सुबोध पत्रिकायें * निकालना, ताकि लड़ाई के ये सिद्धान्त ओर इनका रहस्य उनके दिल में सदा के लिए अंकित हो जाय; उन्हें सरठ और उच्च कोटि का साहित्य हमेशा मिलता रहे; उनके मन और बुद्धि की उन्नति हो, शर उन्नति के इन साधनों को वे अपने बालक्चों के लिए बपौती में छोड़ सकें । ` (१) इस निणेय के अनुसार जबतक लड़ाई चंलती रही, सवैश्नी दोकरलाल बेंकर, अनसूयाबहन ओर छगनलाल गाँधी रोख सुबह-दाम मज़दूरों के घर-घर घूमते; उनकी बस्तियों में जाकर उनके आर उनके घरवालों के नाम-ठाम लिखत, उनके पारिवारिक आय-व्यय के आँकड़े जानते, और इस प्रकार भविष्य में उनकी हालत को ' सुधारने के लिए आवश्यक जानकारी श्राप्त करते; मजदूरों में जो लोग लड़ाई से ऊब रहे थे, या भूख की पीड़ा से भयभीत हो रहे थे, उनको समझाते और हिम्मत दिलाते; मरीज़ों के लिए दवादारू का बंदोबस्त करते, ओर जो रोज़ी था मजदूरी म्बाहते थे, उनके किए वैसे प्ाधन जुटाने की कोशिदा करते थे ) 2.




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