संसार की राजनीतिक प्रणालियां [दुसरा भाग] | Sansar Ki Rajnitik Pranaliyan [Dusra Bhaag]

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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सोधिएर रूस की राजनीतिक प्रणाली १रददी हैं जो बिना दूसरी क्रान्ति के किसी तरह चदली दी नहीं जा सक्कती । लेकिन फिर भी उस सरकार में, उस सरकार की नीति मे और वहाँ के शासकों मे नित्य ही परिवतंन दोते हुए दिखाई देंगे । वहाँ एक दृद्र सिद्धान्त स्थापित हो चुका हैं और जितनी वाते आवश्यक समभी जाती है, उन सभी पर सरकार का पूरा-पूरा नियन्त्रण द । लेकिन फिर भी वदो की नीति और शासन चहुत कुछ लचीला हैं । वहाँ की बहुत बड़ी जनता राज्य की नीति और शासन-सम्बन्धी सभी वातो पर वरावर विचार और वाद- विवादे करती रती दै, ओौर उसकी आलोचना करती रहती द । इसी विचार और आलोचना के अनुसार उसमे परिवत्तेन भी होते रहते हैं । पर विचार और 'झालोचना करनेवाले सभी लोग सव काम वहत दी मिलकर और नीति तथा शासन सफल करने के उद्देश्य से दी करते हैं । और जनता के इस तरह मिलकर सभी काम करने का उदादरण शायद झीस के नगर-राज्यों के चाद आजतक और कहीं नहीं मिलेगा । वे सच बातें विदेशियों को इतनी अधिक सात्रा में दिखाइ देंगी कि वद्द दंग हो जञायेंग । इन सच वातो का अभाव नरास के स्वरूप, लोगों के पनात और बातचीत, समाचारपत्रां के लेखों और नाटकों तथा फिल्मों के विपयों तक पर दिखाई देता है । इस नये शासन की कुछ वार्त तो ऐसी हैं जो खास तौर पर साम्यवादी हैं; च्नीर कु पुरानी णमी चाहें भी हैं लिन्दें सोचिएट राज्य को केवल इसलिए 'झभी तक रक्किव रज्रना पड़ा दै करि वह ऐसे संसार के चीच में पढ़ा है जिस मं नव जगद्‌ पूजीदारी की दी तृती वोल ण्डी द । श्रीर्‌ हन मवचातों क्र टीक्र-ठीक अन्तर साधारण प्रेक्क की समझ में सहज 4 का ॐ 4 [2सं नद छा सकता; ओर न चढ़ जल्दी यदी सम सकता है कि सोविपएट रूस के सामाजिक जीचन में कौन सी बातें स्थायी कपसे र सकेगी और किन बातों का श्रन्त इस थी वाले




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