शतकचूर्णि व्याख्या | Shatak Churni Vyakhya

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Shatak Churni Vyakhya by सिद्धसागर जी महाराज - Siddhsagar Ji Maharaj

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( २) सूत्रों की रचना न करते तो बहुत सम्भव है कपायपाण्ड का भ्रथंही स्पष्ट नहीं हो पाता । आचायें यतितृषभ चूशि सूत्रों के प्रथम रचयिता थे इसलिए उनका भी वही महत्व है जितना घदुखंडागम के रचयिता भाचायं भूतब्लि पुष्पदन्त का | वेते भ्राचायं वीरमेन ने तो घट्खण्डागम के सूत्रों को भी चुशिसूत्र कहा है इसी तरह वेदना खण्डमे जो व्याख्यान रूप गाथायें हैं धवलाकार ने उन्हें चुशि सूत्र कहा है। आचायं यतिवृषम के पश्चात्‌ होने वाले वशि सूत्रकारो में उच्चारणा- चायें हुए । उन्होंने मौलिक रूपसे चली प्रायी श्र तपरम्परा को शुद्ध उच्चरित कप बनाये रखने के लिए उच्चारण की शुद्धता पर विशेष जोर दिया । यद्यपिं यतिवृषम एवं उच्चारणाचार्य के विपय निरूपण मे यत्र तत्र विभिन्नता दिखलाई पड़ती है “लेकिन पर्यायाथधिक नय प्रौर द्रव्याथिक नय की भ्रपेक्षा से विचार करने में उसमें कोई श्रन्तर नहीं आता । उच्चारणाचार्य का समय द्वितीय शताब्दी का अन्तिम पाद एवं तृतीय शताब्दी का प्रथम पाद माना जाता है । प्रस्तुत शतक चि के रचयिता आचा्यवरयं शिवशर्भां हैं जिनका उल्नेख चूशिकार ने श्रारम्भ में किया है । चूणिकार ने उनके प्रति श्रद्धांजलि समपित करते हुए लिखा है कि शब्द, तक, व्याकरण, एवं कतं सिद्धान्त के जानने वाले, प्रनेकवाद में विजय प्राप्त करने वाले द्वारा यह शतक ग्रन्थं लिखा गया है । प्रस्तुत भ्राचायं शिवशर्मा कब हए, उनको श्रन्य कृतियां प्रौर कौन-कौन सी हैं तथा उनके गुरु का नाम क्या था इसके विषयमे यह्‌ शतक्चणि मौन है । दवेताम्नर साहित्य में चतुरंगीय नामक तृतीय अध्ययन की वृत्ति में भावश्यक चि, वाचकं (सिद्धसेन) और शिवशर्मा का उल्लेख हुमा है । शिवशर्मा का जोगा पयड़ि पएसं ठिति अणुभागं” गाथा की प्रथम पंक्ति भी उद्ध,त की गयी है । उनके भनुसार शिवशर्मा ११ वीं शताब्दी के विद्वान्‌ थे । लेकिन अतकं चूशि के रचयिता प्राचार्य शिवशर्मा दिगम्बर जैनाचायं के ऐसा उनके इस प्रन्थ से स्पष्ट पता लगता हैं । उनका समय भी ११ वीं शताब्दी से पूर्व का ही होना चाहिए । क्योंकि चशिकार ने जित प्राकृत गायापों को उद्धत की है वे भाचार्य नेमिचन्द्र के ग्रन्थों की गायाएं हैं । इस शतक प्रन्य पद जिस आचार्य ने चूणि लिखी, उसके बारे मे भी स्वयं चणिकारमौनहै। `




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