स्वर्ण-पथ | Swarna-Path

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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वम महान्‌ द्ये १७ उन्होंने अपने मनः्क्षेत्रमं ऐसे उत्कृष्ट चित्र विनिर्मित किये थे कि उनकी आत्मदृष्टि सदेव उन्हें उसी ओर प्रेरित करती रहती थी । हमारे मनःक्षेत्रमें जिन-जिन विचारों; भावनाओं तथा आकाछाओंका उद्रेक होता है, वे ही क्रमशः हमारे भाग्यका; भविष्यका और सफलताका निर्माण किया करती है । जिसे हम मानवीय विन्युत्‌-पवाह ( 267७००२] 1038०6६8 ) के नामसे पुकारते हैं; वह हमारी विचार-शक्तिकी प्रबल तरंगें हैं; जो मनःक्षेत्रसे इच्छादाक्तिके अनुसार प्रबलता धारण कर प्रकट हा करती ई । जिस व्यक्ति. यप्र विचारसम्पन्न इच्छाशक्ति होती है, उसका विद्युत्‌-प्रवाद वायुमण्डमें अधिक क्षोम उत्पन्न करता है और अपने विषयमें तुच्छ विचार रखता है; अपनेकों बहुत छोटा मानता है और छोटा गिनता है; उसमें यह विद्युत-प्रवाद ठोप हो जाता है । उसका मुख तेजस्वी नहीं रहता । वह दूसरेको आकर्षित नहीं कर पाता; उसका वजन तिनकेके समान होता है । हमारा एक-एक विचार हमारे व्यक्तित्वके निर्माणमें लगा है । हमारी एक-एक कब्पना» एक-एक महत््वाकाड्डा हमें ऊँचा-नीचा किया करती है । हम जैसा सोचते-विचारते हैं; प्रकट करते हैं; बोलते हैं, हमारी जेसी- जैसी मानसिक, वाचिकश्एवं दारीरिक क्रियाएँ: होती है; जेसी भावना में ह्म निरन्तर रमण करते हैं; तदनुकूल दी ' हमारा पथ प्रदयास्त अथवा कण्टकाकीर्ण होता है | हम अपनी शक्तियोंको जेसी आज्ञा देंगे; वेसा ही कार्य वे करने लगेंगी । उनकी विशेषता यही है कि दम जैसी चाह करगे वे स्वभावतः उन्हीं पदार्थोंको उत्पन्न करेंगी । यदि आपने उनसे बहुत कुछ आशा की है तो निश्चय रखिये; वे आपको बहुत कुछ सहायता प्रदान करेंगी । वे अवद्यमेव आपके उत्कृष्ट मनोरथॉकों क्रियात्मक स्वरूप दे देंगी ।




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