श्रावक धर्म प्रकाश | Shravak Dharm Prakash

Shravak Dharm Prakash by ब्र. हरिलाल जैन - Bra. Harilal Jain

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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@ थो स्वज्देवको नमस्कार हो प्ररचनका उपोद्घात यदह पद्मनन्दी पंचकिषतिकाः नामक शाखका सातस्प अधिकार बज सका के. । आत्माके आनन्दम द्ुल्ते ओर वन-जगलमें निवास करते यीतरागी दिगम्बर मुनिराज श्री पद्मनन्दी स्वामीने लगभग ९०० वषं पटले इस हाखकी रखना की थी। इसमें कुल छब्बीस अधिकार हैं, उनमेंसे सातवाँ ““ देहवत-उद्योतन ' नामका अधिकार अल रहा रै। मुनिदह्ाकी भावना धर्मीको दोती है, परन्तु जिसके चेती शा न होसक्के वह देशवतरूप श्चरावक्के धर्मका पालन करता है। उस श्रावकः के भाव कैसे होते हे, उसको स्वैशकी पहन्वान, देव -शाख-गुरुका बहुमान आदि माव कैसे होते है, आत्मके भानसदहित रागक्षी मन्दनाके प्रकार कैसे होते दें वे इसमें बताये गये हैं। इसमें निश्चय-व्यवदारका सामंजस्यपूर्ण सुन्दर वर्णन है । यह अधिकार ज़िशासुओंके लिए उपयोगी दोनेसे प्रवचनमें तीसरी बार चल रद १




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