भारतीय साहित्य भाग - 3 | Bharatiy Sahity Bhag - 3

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Bharatiy Sahity Bhag - 3   by डॉ विश्वनाथ प्रसाद - Dr Vishwanath Prasad

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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१२ भारतीय साहित्य [वर्ष ४ 0 न [1] प्रग्र प्रगोलीक़त अरे संवृत से कुछ ऊँचा, उदाहरणायं 1577711 [5110 | पूर्मी [1] श्रग्र भ्रगोलीकृत संवृत से कुछ नीचा, उदाहरणाथं 11:111। [1:71] ^तिल्ली' । यह संस्वन केवल तब श्राता है, जब दीघंता का स्वनिम इसके साथ हो । 1111 = [7] पडव गोलीकृत श्रधं संवृत से कुं ऊचा, उदाहरणाथं 0५२ [11२] (दरार [ए] परच गोलीकृत संवृत से कृ नीचा, उदाहरणायं 1]7प्:२। 1 [पः २] पत्तों से बना हृश्रा दोना'। यह संस्वन भी केवल तव श्राता है जब दीघंता इसके साथ हो । ।९।- [५] श्रप्र ग्रगोलीकृत श्रं संवृत, केवल [9] [*+] के पहल उदाहरणाथं {८८४६1 [८४८्९ः| 'पुकारना' [[)] अ्रग्र अ्रगोलीकत श्रध संवृत प्रौर श्रधं विवृत के बीच के ऊंचाई का, देप स्थितियों मे, उदाहरणाथं 1111011 [1111प्‌.] आाँख' [8] श्रग्र श्रगोलीकृत भ्रधं विवृत, जब दीघंता का स्वनिम इसके साथ हो, उदाहरणाथं । 71 € : १। 7118 : | लोहा 10 = [0] पर्व गोलीकरृत भ्रधं संवृत, केवल [$] [\५) के पहले, उदाहरणाथ । १०९०. [00०४९:] पीठः [[1] परच गोलीकृत भ्रधं संवृत भ्रौर श्रधं विवृत के बीच कौ ऊंचाई का, शेष स्थितियों मे, उदाहरणाथं । ८०1५८ [८(]1 ह :] मेदक !)] पञ्च गोलीकृत भ्रधं, विवृत, जब दीघंता इसके साथ हौ, उदाह्रणाथं ।00:2| [४२:२| “सिर' [श] श्रग्र प्रगोलोकृत विवृतसे कृचं ऊंचा, केवल [$] के बाद, उदाहरणार्थं ।11:%2॥ (या 11:11, या ।1{1:€81) [11 : ४] “भ्रोठ' 121 = [4] शेष स्थितियों मं प्राने वाला मध्य प्रगोलीकृत विवृत से कुछ ऊँचा, उराह्रणाथं ।} 211 [211] .सम्पक' । ।21 का एक भ्रत्य संस्वन जब दीघंता के साथ श्राता है, तब बहुत सुक्ष्म रूप से श्रलक्षित सा विवृत को श्रोर भरुक जाता है। यहाँ उसे पृथक चिज्न देना श्रावश्यक नहीं है । उसका उदाहरण है--112:111 [2:11] कोई २.३.१. उपर २.१. मं लिखा जा चुका है कि दाब्दान्त कौ स्थिति में दीघं स्वर प्रौर हृस्व स्वरके मध्य का विरोध लुप्त हो जाता है । उस स्थिति में ध्वन्यात्मकं रूप से तो स्वर दीघ॑ ही होत। है, किन्तु वहाँ की दीघंता को मेने स्वानिमिक न मानकर, स्थित्यनुकूलित माना है ।




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