कल्पवृक्ष | Kalp Vraksh

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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क ल्पदृक्ष ९३हमीलिए फते ह्‌ कि केह्पवृक्ष के नीचे सकलाप्रात मे भी चाहो सो प्राप्त कर लो | पर उपलब्धि की यह वास्तविकता कहरपकक्ष के नीचे तक हो सीमित रहती है। कल्पवुक्ष की छाया से याहर मन का राज्य समाप्त हो जाता है भ्ौर मनुष्य जहा-का तहा हो रहता हे । विचार गरस्तिष्क मे उत्पन्न होते हूं । मरस्तिप्क की सज्ञा स्त्रग है, जहा ज्योति लोक है। इसी कारण कल्प- वेक्ष को स्य कः युक्ष कहा यथा है । कत्पवृक्ष का ताम पारिजात है, क्यो कि यह जनम तेतें ही प्राणी के साथ उपपन्न होता हे । वश्तुतत जनम से लेकर मप्यु- पयत मपुध्य का कया विकास है? इस प्रदन का उत्तर यही है कि मानव जीवन मन कौ ग्रन्तमिहित शक्तियों का क्रमिक उदघादन है । बालक सौर युवा मे जो श्रन्तर है, वह्‌ मन की य्रवस्था का भेद है । संसार के उत्कृष्ट मस्तिष्क बाले सकत्पवामु प्राणी मे रौर एके साधारण मनुष्य में भी जो भेद है, हूँ मन की शक्तियों के भेद के कारण है ; मन ही मनुष्य का दूसरे मनुष्य से भेदक है । जो मनुष्य सपने भीतर सकल्पवादु मन का भरण करते हूं, वे ही राष्ट्र की निधि हूं । साना प्रकार्‌ के दुबल विकल्पा से प्रताडित म्रस्थिरचित्त व्यक्तियों का समाज के लिए क्या मूल्य हो सकता है? अनेक भ्राधायों हारा विद्यालयों में लिक्षा के आयोजा इसीलिए है कि सन्ते श्रर्थो म सकल्पयान्‌, मने वित से वनी, मनुष्या का निर्माण किया जाय ।कल्पवृक्ष स्वर्गीय या दिव्य बनस्पति है। यजुर्वद में मन का विदौपरा देव कहा गया है । प्रश्न यह है कि इस स्वर्गीय वनस्पति को परिचय प्राप्त करके हम अपना क्या कल्याण कर सकते हैं” कल्पवुक्ष, जैसा फिनाम से प्रकट हैं, कल्पनाध्रधान है । कल्पना या सकृत्प दो प्रकार का होता हैं एक शिव, दूसरा श्रशिव । डिवसकल्प ही मानव-करथाशु के हेतु हो सकते हैं । पौराश्गिक उपाश्यानों मे भी प्रसिद्ध हूं कि यदि हम कत्पबक्ष के नीचे प्रमृत की कामना करे तो बहु प्राप्त हो सकता है | पर यदि भय या दुबल सबल्प या मानसिक विकल्प के कारण मृप्यु वी वातं हमारे मन भे भरा गई, तो बह भी तत्काल ही प्राप्त होती हैँ । इसलिए कतपवृक्ष के जगत मे संपुण्ध का कल्याण केवल शिवपकत्पो से ही सिद्ध है! सकता है ।




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