शब्दो का जीवन | Sabdho Ka Jivan

55/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Sabdho Ka Jivan by डॉ वासुदेवशरण अग्रवाल

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about डॉ वासुदेवशरण अग्रवाल

Add Infomation About

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
शब्द जनमते हैं श्१ ् कै. देहातों में रहने वाले झशिचितों में भी 'कोर्स', 'फ़ाइन' श्रौर 'सुपरफ़ाइन' के साथ फैल गया है । मर (ए८प८द नाम का. एक जुलादा था । यह १७२१ में पैदा हुआ था तथा १८९६ में मरा । 'वेदस्टर' में इसे फ्रच माना गया है, यद्यपि यह ध्रंप्रेज़ था। १८४४ में इसने एक ऐसा मपाला सेयार किया जिसमें डुवोने से सूती कपड़ों में स्थायी चमक थ्रा जाती थी श्र जो घुनाने पर भी खराब नहीं होती थी । इसी जुलाहे के नाम पर इस मसाले में डुबोने की क्रिया को 'सर्सराइज्ञ' कदने लगे श्र इस मसाले सें डुबाए कपड़े 'मर्सराइज़ड कहे जाने लगे । झय हिन्दी में भी इस मसाले में डुबाए कपड़ों को “मर्सराज़' ही कहने लगे हैं । अलाय्वलाय यह एक हिन्दी शब्द है जिसका श्रर्थ 'विकार' या 'जवाल' होता हैं । प्रयोग चलता हे--ऐसे श्रलाय-बलाय को मेरे पास न भेजो । इसमें यों तो 'चलाय” शब्द श्ररवी शब्द 'यला' से जनेमा लगता है श्रौर झलाय उसी का युग्मक या छाया-रूप ज्ञात होता है, पर यथार्धतः वात यह नहीं है । इस नाम का कोई देस्य था या देव्य-वन्धु सी 1 कुछ परि- च्तन के साथ ये शब्द '्रथवंचेद के मन्त्रों में प्राए हैं । श्ाज के मन्च्- साहित्य सें भी ये मिलते दें : लाइन... वलाइन । द सिंसोइया पर के डाइन । नोना चमाइन । इत्यादि यहाँ 'इन' लगाकर उन्हें खो चनाकर डाइन कहा गया हूं । नाथ- सम्प्रदाय के प्रसिद्ध नाथ गोरखनाथ सें भी ये शब्द कुछ परिवर्तन से प्पंची” अर्थ में प्रयुक्त हुए हैं: न्यंद्रा कहे मैं द्लिया-वलिया, ब्रह्मा विष्न मद्दादेव छुलिया | पू,. पट0डाटा'5 पट ाटाए8०081 पिटपंण्पशाऊ, द.09000, 1927,




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now