वैष्णव की फिसलन | Vaishnav Ki Fisalan
श्रेणी : साहित्य / Literature

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
2 MB
कुल पष्ठ :
124
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)दिनि मे यह् सव सोचता हं श्रौर रात को मे विचित्र सपने घ्राति है ।एक रात सपना श्राया--राप्ट्र ने श्रकाल-उत्सव मनाना तय कर
'लिया है । कई क्षेत्रो में हो रहा है । एक क्षेत्र में श्रकाल-उत्सव मैंने सपने
में देखा ।आसपास के च।र-पाँच गाँवों के किसान, स्त्रियाँ, बच्चे इकट्ठे थे ।पण्डाल सजाया गया था} मन्दी प्रकाल-समारोह का उद्घाटन
करने झ्रानेवाले थे । पटवारी ने भूखों से चन्दा करके गुलाबों की मालाएँ
कसवे से मंँगवा ली थी ।स्त्रियाँ खाली मगल-घटों में सूखे नाले के किनारे की घास रखकर
कतार में चल रही थी । ये गा रही शी--'भ्रम्के बरस मेघा फिर से न
बरसो, मय्रल पड प्रकाल रे {'
श्रोवरसीयर श्रौर मेट उनमें से अपने लिए छाँट रहे थे ।
“साव, उस देखो, केसी मटकती दहै 1 “
“अरे, मगर इस सामनेवाली को तो देख ! दो बार पूरी रोटी खा
ले तो परी हो जाय 1मगर साब, सुना है, तहसीलदार साव भी तथवियत फेंक देते है ।'”“अरे, तो “था प्रापर चेनल” ! सरकारी नियम हम थोडे ही
तोडेंगे ।”'हुड्डी-ही-हड्डी । पता नही, किस गोंद से इन हड्डियों को जोड़कर
'प्रादमी के पुतले बनाकर खड़े कर दिये गये हैं ।यह जीवित रहने की इच्छा ही गोद है । यह हड्डी जोड़ देती है ।
झँतें जोड़ देती है ।सिर मील-भर दूर पड़ा हो तो जुड़ जाता है ।जीने की इच्छा की गोद बड़ी ताकतवर होती है।पर सोचता हू, ये जीवित क्यो हैं ?थे मरने की इच्छा को खाकर जीवित हैं । थे रोज कहते हैं--इससे
सो मौत श्रा जाय तो श्रच्छा !पर मरने की इच्छा को खा जाते हैं । मरने की इच्छा में पोषक तत्त्वशोते हैं 1भकाल~-उत्सद / १७

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