जलते और उबलते प्रश्न | Jalate Aur Ubalate Prashn

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Jalate Aur Ubalate Prashn by विश्वम्भरनाथ उपाध्याय - Vishwambharnath Upadhyay

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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राहित्याछोचत- धारणा और पद्धति ३ घाराणाओ वी या तो छोन दते हैं अथवा उनमें सशोधन कर लेते हैं । फिर भी घारणा जौर पद्धति का सम्बघ धघनिप्स होता है और यदि किसी के वे द्वगत घारणा वियास को परख लिया जाए तो उसके द्वारा प्रयुक्त पद्धति या पद्धतिया के प्रयोग के स्वरूप को वे द्वगतघारणा के निकट पाया जायगा 1 साहित्यसप्टि की माति सग्हिप्यालोचन भी अतट प्टिपरकथधिक होता टै । एक कृवि अपने निप्कर्पो, सवेदनो, भावों भौर कल्पनामो का किसी इसि के रुप में कस प्रयोग वरता है यह मे कवि प्रयोग द्वारा प्रमाणित कर सकता है न आलोचक, क्योकि साहित्य और कला द्रप्टा (भोक्ता) और वास्तविकता के 'दृद्' और सगति' का परिणाम हैं । कहां साहित्य-कला में जीवन वी अनुकति होती है, कही पुनस जन, कही परिवतन कही समपण, कही सुधार, वही मात्र ऐदिय सवेदनों का चित्रण } चिन्नु इन सभौ क्रियाभो म दो तत्व सामा य हैं “यक्ति और वास्तविकता । तीसरा तत्व है इन दोनो का आपसी सम्बध । इस संम्ब ध या. सम्पक वा स्वरूप जसा होगा, वला-पद्ति भी उससे अवद्य प्रभावित रोगी । रसी प्रकार साहित्यालोचन मभौ वारत ध के प्रति अनुसधानवत्ता की धारणा के अनुसार उसकी पद्धति प्रभावित गी 1 व्यक्ति की वास्वविकता वे प्रति प्रतित्रिया साहित्य मे अतमुखी होकर ही व्यक्ति होती है अत जब तक बिसी एसे यत्र का आविष्कार नहीं हौ जाता कि सेजनप्रतरिया प्रारम्भ होते ही शरीर से सटे यप्न द्वारा अवयव सस्थान या स्नायुमण्डल की पूण भरतिङति हमारे सम्मुख उपस्थित हो सके, त्तव तव 'अतष्ट प्टिवादी पद्धति” काप्रयोगअवय होगा । यदि इस विधि द्वारा भय ययक्ति को चिंतन प्रत्रिया दिखाई नहीं जा सकती तो प्रत्येक की अन्तह्‌ प्टि जपन अपने गतानुगतिक सस्वार परिरिथतियों आदि के वारण भिन्न होगी 1 अतएव सहमतियों वे साथ जसहमतियों का विकास भी साथ ही-साथ ह्‌ गा ओर यह प्रन्रिया यो चलती रहगी-सजन पघत्रिया-सहमत्ति न- भसहमति- मटमति-असहमति-सगोधन-सहमतति--असटमत्ति 1 माहित्यालोचने मे द्वितीय पदति * अवयष वि रेपणवादी” पदति है । मह्‌ पद्धति भी व पूणनी ह । वदपर रह सुलि ने “री को. निप्पतति म विभाव, अनुभाव सचारी स्यायो की अरग अरग व्यायस्या कौ है भीर इनवे विशिष्ट समीकरण से “रस थी. निप्पत्ति सिद्ध वी है। आज मी साहित्य में १ उत्तदच्०्ञु्ल्टघिएा २ इस धारणा म भाव और द।स्तविवत्ता वी अभित्ता (ए०्णाघण्च) मृ सम्बध प्र विषकुल वर नहीं त्या गया । वास्तविकता के 'धत्ति एक




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