जीवन निर्वाह | Jeevan Nirvah [ Part - Iii ]

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Jeevan Nirvah [ Part - Iii ] by नाथूराम प्रेमी - Nathuram Premi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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8६००१ ७०-०० जज जम 7. २ सनुष्यका मनुष्यत्व । পিসি (88 जादिफा पशुजीवनसे उन्नति करते करते मनुष्यत्त प्राप्त करनेका पूर्वोक्त वर्णन मालम हो जानेपर यह थात सहज ही समझी जा सकती है कि मनुष्योंको अपना मनुष्यत्व कायम रसने भौर आगेको उसे अधिकाधिक उन्नत करनेके लिए कौन कौनसे कर्तव्य पालन करने चाहिए | क्योंकि जिन सब बातोंकी बदौलत मनुष्यको अपने जीवन-निरहकी अनेक उपयोगी वत्तु प्रात होने ठगी, तथा जिनकी बदौछत उसका जीवन पशुजीवनसे सर्वथा भिन्न होकर अत्यन्त सुखमय तथा परम श्रेष्ठ बन गया, उन सब बातोंकी रक्षा करना और उनको उन्नत बनाना मनुष्य-जीवनका मुख्य कर्तैग्य हँ-और उनसे ही उसके मजुष्यत्वकी रक्षा हो सकती है | उक्त बातोंको हम तीन श्रेणियोंमें विभक्त करते है-(१) विचारशक्ति--जिसके द्वारा मनुष्य अपनी उन्नति और सुखशान्तिके बरढ्गनेवारे नवीन उपायोंको खोजता और प्राचीन असुविधाजनक तरीकोंको छोड्ता जाता है । (२) वच्चनशक्ति--जिंसके द्वारा बाटकों तथा“नवयुवर्कोकी अपनेसे बड़े , तथा अनुभत्री पुरुषोंकी जानी बूझी हुई वत्ते मादूम दोती रहती हैः * और आगे चकूकर जब ये ही बालक तथा नवगुवक' सयाने होते हैं ' या पितृपदको पाते हैं तब वे अपने पूर्वजोंकी सुनी हुईं और अपनी बुद्धि तथा अनुभवसे प्राप्त की हुईं बातोंको अपने बच्चोंकों सुनाते या सिखाते हैं | इस प्रकार' इस बातचीत करनेक्की शक्तिकी बदौलत मजुष्य उत्त सब छोगोंक़ी खोजी,हुईं वार्तोको जानता रहता है कि.जो उससे सैकडों-हजारों पीढी पहले उत्पन्न हुए थे । नवीन लोग परचीने छ्ोगोंके अचुभवसे,जानी हुई बातोंमें अपनी बुद्धिको छड़ाकर कुछ




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