आज के उर्दू शायर और उनकी शायरी | Aaj Ke Urdu Shayar Aur Unki Shayari

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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जोदा ७७ श्राद्यावाद मे है। लेकिन इसका श्रभिप्राय यह नही है कि श्राज यदि क्रांति की उद्धावना सुस्पष्ट हो छुकी है श्रौर हम पूरे विदवास के साथ शुद्ध-्रशुद्ध की परख कर सकते हैं तो झ्राघी सदी तक पूरे के पूरे राष्ट्र को प्रभावित करने वाली 'जोद' की शायरी श्रपने स्थान से हट गई है । क्योकि यह एक ऐतिहासिक सचाई है कि किसी की दुर्व्य॑वस्थाग्नो के विरुद्ध घृणा का नकारात्मक भाव ही (जबकि सामाजिक वोध श्रप्रौढ हो) भ्रागे चलकर स्वीकारात्मक रूप धारण करता है झौर वह छणा-भाव श्राप-ही-श्राप वैज्ञानिक हृष्टिकोण मे ढल जाता है। लैनिन ने टाल्स्टाय के सम्बन्ध मे कहा था कि टाल्स्टाय श्रष्यात्मवादी है लेकिन उसने रूसी किसानो को बहुत समीप से देखा श्रौर समभा है, श्रत. उसके साहित्य से रूस की क्राति को पुरी एक सदी की मजिल मारने मे सहायता मिली है। ठीक यही बात “जोश की शायरी के वारे मे कही जा सकती है । 'जोश' की शायरी ने भारत के क्राति-ग्रादोलन के लिए न केवल रास्ता साफ किया वल्कि हज़ारो-लाखो नौजवानों को क्राति-सग्राम के लिए तैयार किया । 'जोश' मलीहावादी बड़े सिडर, साहसी तथा भावुक हैं । श्रभी वे श्रापकी भाषा तथा शैली की चूटियाँ गिनवा रहे हैं श्रौर अ्रभी झापके किसी लेख या शेर की प्रशसा कर रहे है । श्रभी नई पीढी के लेखको को कोस रहे है भ्ौर अ्रभी साहित्य की वागडोर उनके हाथो में थामकर निर्िचित हो जाते हैं । श्रभी किसी के दुर्व्यवहार पर श्रपना रोप प्रकट कर रहे हैं शरीर भरी सभा मे उसे कभी मुह न लगाने की सौगधें खा रहे हैं कि उस व्यक्ति ने श्राकर उनके कान मे कुछ कहा श्रौर उन्होने लोगो की नज़रें बचाकर नोटो की एक गड़्डी उसकी जेव मे डाल दी । प्रधान-मत्री से लेकर सिटी-मजिस्ट्रेट तक श्रौर १. शायद ही कोई समय हो जब उन्हे एकात प्राप्त होता हो, श्रन्यथा क्या घर शौर क्या दफ्तर, लोगो का एक समूह हर समय उन्हें घेरे रहता है । पिछले दिनो लोगो के श्राक्षमणो से तग श्राकर उन्होंने श्रपने दफ्तर में एक तल्ती लगवा दी थी जिस पर श्रग्रेज़ी श्रक्षरो में लिखा था कि “यदि श्राप समय बिताने के विचार से यहाँ पघारे हैं तो सूचनार्थ निवेदन है कि यह स्थान इस प्रयोजन के लिए नहीं है ।” लेकिन दूसरे दिन भी जब एक चौकड़ी सुवह से शाम तक उनके कमरे में जमी रही तो उन्होंने धूम कर तख्ती की श्रोर देखा । देसा तो तज्ती पर से “नहीं” गायव था घौर श्रव तख्ती पर की पंक्तियों का श्रर्थ यह था कि यही वहू स्थान है जहाँ श्राप श्पना समय विता सकते हैं । कुछ लोगो का खयाल है कि यह तददीली स्वय “जोश साहव ने ही की थी ।




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