महबंधों भाग - 5 | Mahabandho Bhag - 5

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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बंधसण्णियासपरूवणा ७ ओरालि०्ञअंगो ०-बज्जरि ०-पसत्थापसत्थ ० ४-तिरिक्खाणु ०-अगु ० ४३-पसत्थ ५ -तस ०४ - थिरादिछ०-णिमि० णिय० अर्णतगु० | १३. अष्पसत्थ ० उ० बं० णिरय०-तिरिक्‍्ख०-असंप०-दोआणु ० सिया० \ त॑ तु० छट्दाणपदिदं० । पेचिदि०-तेना०-क ०-पसत्थ ०४-अगु ° ३- तस -णिमि० णिय० अणंतगुणहीणं० । ओराछि०-वेडव्वि ०-दोश्ंगो०-उस्नो ° सिया० अणंतगुण- हीणं० । दंड ०-अण्पसत्थवण्ण ०४ -उप ०-अथिरादिद्° णिय० । तं तु° बहाण- पदिदं° । एवं दुस्सर० । १४, सुहुम० उ० बँ० तिरिक्ख ०-एटंदि ०-ओरालि०-तेजा ०--क ०-हुंड ०- पसत्थापसत्थवण्ण ०४-तिरिक्लाणु०-अशु ०-उप °-थावर-जथिरादिपंच °-णिमि० णिय० अणंतगणही्णं० । अपलर-साधार० णिय० | तं त° दहाणपदिदं० | एवं अपज्जत्त-साधारण ० । पंचंतराइयाणं णाणावरणभंगो 1 १४, णिरएसु सत्तण्णं कम्माणं ओघं । तिरिक्ख० उ० बं० पंचिदि०- শী ^ পি ति ज जि শি পির শী পপ ४०.४० ०५०. ५० ५ ननन १ 47 वाला जीव तिर्यञ्चगति, पंचेन्द्िय जाति, शओ्मौदारिक शरीर, तेजस शरीर, कामण शरीर, सम- चतुर संस्थान, ओौदारिक अआ ङ्गोपाङ्ग, वज्रषेम नाराच संहनन, प्रशस्त बणं चतुष्क, अप्रशस्त वणं चतुष्क, ति्य्गव्यानुपूरीं, अगुरुलघु चपुष्क, प्रशस्त विहयायोगति, त्रसचतुष्क, स्थिर आदि छह ओर निर्माणका नियमसे बन्ध करता है जो अनन्तगुणे हीन चअनु्छृष्ट अनुभागका बन्ध करता है । १३. अप्रशस्त विहायोगतिके उत्कृष्ट अ्रलुभागका वन्ध करनेवाला जीव नरकगति, तियेच्च- गति, असम्परघ्रास्पाटिका संहनन ओर दो आनुपूर्वीका कदाचित्‌ बन्ध करता है । यदि बन्ध करता है तो उत्कृष्ट अनुभागका भी बन्ध करता है और अनुस्कृष्ट अनुभागका भी बन्ध करता है । यदि अनुत्कृष्ट अनुभागका बन्ध करता है तो बह छह स्थान पतित हानिको लिये हुए होता है । पच्च न्द्रिय जाति, तेजस शरीर, कामण शरीर, प्रशस्त वणं चतुष्क, अरगुरुलघु चिक, त्रसचतुष्क त्र निमांणका नियमसे बन्ध करता है जो अनन्तगुणे दीन चअनुच्छष्ट अनुभागको लिये हुए होता है । ओओदारिक शरीर, वैक्रियिक शरीर, दो आङ्खोपाङ्क ओर उदयोतका कदाचित्‌ बन्ध करता है जो अनन्तगुणे हीन अनुकृष्ट अनुभागको लिये हुए होता है । हुण्ड संस्थान, अप्रशस्त बणीचतुष्क उपघात ओर अस्थिर आदि छहका नियमसे बन्ध करता है । छन्तु वह उत्क अनुभागका भी बन्ध करता है ओर अनुक्छष्ट अनुभागका भी बन्ध करता है । यदि श्नु अनुभागका बन्ध करता है तो वह छह स्थान पतित हानिको लिये हए होता है । इसी प्रकार दुःस्वर प्रकृतिकी मुख्यताषे सन्निकषे जानना चाहिए । १४. सूक्ष्मके उत्कृष्ट अनुभागका बन्ध करनेवाला जीव ति्यंञ्चगति, एकेन्द्रियजाति, ओदारिकशरीर, तेजसशरीर, कार्मणशरीर, हुण्ड संस्थान, प्रशस्त वर्णेचतुष्क, अप्रशस्त बणं चतुष्क, तियंत्वगत्यानुपूर्तवी, अगुरुलघु, उपधात, स्थावर, अस्थिर आदि पाँच और निर्माणका मियमसे वन्ध करता है जो अनन्तगुणे हीन अनुक्छृष्ट अलुभागको लिये हए होता है । अपर्याप्र भौर साधारणका नियमसे बन्ध करता है । किन्तु वह उत्कृष्ट अनुभागका भी बन्ध करता है और अनुत्कृष्ट अनुभागका भी बन्ध करता है। यदि अलुत्कृष्ट अनुभागका बन्ध करता है तो वह छह स्थान पतित हानिको लिये हुए होता हे । इसी प्रकार अपयाप्त और साधारणकी मुख्य तासे सन्निकषं जानना. चादिए । पाँच अन्तरायोकी मुख्यतासे सन्निकषेका भङ्ग ज्ञानावरणके समान हे | १५. नारकियोंमें सात कर्मोंका भंग ओघके समान है। तिर्यश्लगतिके उत्कृष्ट अनुभागका




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