आध्यात्मिक जीवन | Aadhyatmik Jeevan

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Adyatmik Jivan by कौशल्या देवी मेहता : Kaushalya Devi Mehata

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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६*६-) अध्यात्म मार्ग पर खलते हे दमें संसार में अपना-अपना काय॑ तो फरना ही पड़ता है, फिन्तु हम यद्द इसीलिये करते हैं कि हम अपने सच्चे अन्तज्ञीचम के पहचानते हैं । एक अभिनेता रंगमंच पर अपना अमिनय करता है, फ्योंकि डसका अपना एक अलग क्रमवद्ध व निरन्तर जोवन है। यह अभिनेता ठीक उसी प्रकार भिन्न भिन्न समय मं भिन्न मिन्न पान्न का कार्य फरता है जिस प्रकार हम जब दूसरे जन्मों में लोटते हैँ तब दूसरे दूसरे भ्कार का शरीर घारण कर लेते हैं; किन्तु प्रति समय उस श्रभिनेता फे मद्ध्य के रुप में एर्व कलाकार फे रूप में अपना एक सच्चा जीवम प्राप्त है, और अपने उस सच्चे जीवन फे। सदा जानते रहने पे कारण ही वह रंगमंच के क्षणिक जीवन में कुशलता पूर्षवक “अभिनय करता है। ठीक इसो प्रकार हम भी इस श्रस्थायी स्थूल भीवन में अपना कार्य कुशलतापूवंक करना चाहते हैं, क्योंकि इसके पीछे चह महाम्‌ वास्तविकता है जिसका यह एक छोटा सा अंश है । यह स्पष्ट हा जाने के पश्चात्‌ हम देंगे फि हमारे लिये इख वादय जगत्‌ फा केषल इतना ही महत्व है कि हमारा अभिनय फैशलपूर्ण हे! । इस बात का ता बहुत ही थेड़ा मूल्य है कि हमें उसमें क्या और केसा पाड करना हैं और इस वहुरुपिये संसार में हमारे साथ कया पया वीतता दै । पक अभिनेता का यह कर्तव्य हो सकता है कि यह रंगमंच फे कल्पित शाक व फठिटाइयों को भेले, विन्तु वह उसते विचलिव तनिक भौ नदीं ইালা। हृणन्त फे लिये, रंगमंच पर बह नित्य रात्रि में एक बन्द युद्ध में मारा जा सकता है, किन्तु उसका यह यनावदी मारा जाना ४सफे लिये विल्कुल अर्थद्वीन्‌ है; उसे ते केवल एफ हो यात से प्रयोजन रहता हैकि वह अपना भ्रमिनय साँगेपांग निभावे ।




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