उपनिषदों की कहानिया भाग 2 | Upnishdo Ki Kahaniya Bhag 2

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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महात्मा पिप्पलाद और उनके शिष्य षू कवन्धी सहम गया | उसने अपनी आँखें सामने से हटाकर महर्षि के चरणुं पर लगा दीं। पिप्पलाद वोले--वृत्स कबन्धिन्‌। मेरे साथ रहने मे तुम न्ोगों कः जो कठिनाइयाँ उठानी पड़ गी, सम्भव है उनका ध्यान तुम्हें न होगा। ठ॒म्हें यह तो विदित ही है कि भेरा कहीं कोई नियत निवास नहीं है, आज यहाँ तो कल वहाँ । खाने पीने या विछाने- ओोढ़ने की दशा भी तुम देख रहे हो। अच्छा होगा कि इस बड़े संकल्प के पहले तुम सब लोग खूब सोच-विचार लो | मैं विचार करने पर अधिक जोर इसलिए दे रहा हूँ कि आज तक कोई भी ऋषिकुमार मेरी इस अग्नि-परीक्षा में सफल नहीं हुआ, कोई छ मीना में छोड़ चला तो कोई बीच में ही |? कबन्धी थोंड़ी देर तक विचारता रहा । फिर हाथ जोड़ कर विनीत स्वर में वोला--'पूज्यचरण | हमारे संकल्प कभी डिगने वाले नहीं होते। कम से कम में तो आपके चरणों के समीप रह कर अपना जीवन धन्य मानू गा। मुझे इसमें कोई विकल्प न तो है ओर न कभी होगा ।! कवन्धी चुप हो गया | वाल में खड़े हुए साथियों में से सव ने महात्मा पिप्पलाद के सामने एक वष के कठोर ब्रह्मचय का पालन करते हुए उनके सतत सान्निध्य में रहने की तीत्र इच्छा प्रकट की और इसमें ग्पना परम सोभाग्य बताया | महात्मा... पिप्पलाद ने-_कहा--ऋषिकुमारों | अच्छी - वात है, आज से तुम सब मेरे साथ रहो, और मन समेत इन्द्रियों को धीरे-धीरे वश में करने का अ्रभ्यास करो। इसके वाद वचन को और फिर कर्म কী । পন্থী मंन सब से बढ़ कर चंचेल ओर दुर्गाह्म है, पहले इसी.को वश में करो | पर इसे वश में करने का सबसे सीधा किन्तु कठोर उपाय है, दस्सों इन्द्रियों को वश में करना। धीरे-धीरे अभ्यास करों और आने वाली कठिनाइयों को जीतने का यक्ष करो। जव मैं जान लूँ गा कि तुम मन, बचन, कर्म से पूर्ण आस्तिक भाव को प्रास कर चुके हो




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