बुद्ध और बौद्ध-धर्म | Buddh Or Bauddh Dharm

Buddh Or Bauddh Dharm by अज्ञात - Unknown

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about अज्ञात - Unknown

Add Infomation AboutUnknown

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
डे महान बुद्ध बुद्ध ने यद नियम बनाया कि भविष्य में कोई.भी बालक बिना उसके माता-पिता की सम्मति के भिज्नु नहीं चनाया जायगा | जब बुद्ध राजगृद्द को लौट रहा था तब वद्द मल्लों के नगर अचूपया में ठद्दरा श्रौर कोली तथा शाक्य-घंश के बहुत से पुरुषों को अपना शिष्य घनाया । शाक्य-चंश का कुमार झनिरुद्ध झपनी माँ के पास गया छर उससे भिन्न दोने की आज्ञा माँगी । उसकी माँ ने कद्दा--यदि शाक्यों के राजा फड्िय संसार त्यागकर भिक्त दो जायें तच तू भी भिज्लु द्वो जाना । तच अनिरुद्ध फडिय के पास गया और उन दोनों ने उसी सप्ताह में दोद्ध-धर्म को अदण करके भिन्न होने का निश्वय कर लिया । इस प्रकार शाक्य राजा फड़िय अनिरुद्ध आनन्द भूगु किविल श्औौर देवदत्त सब मिलकर शपने-झपने मदलों से निकले मानों वे श्रानन्द्‌ बिद्दारके लिए जा रदे हों । उनके साथ प्रसिद्ध इज्ाम उपाली भी था । नगर से चादर जाकर उन्द्ोंने अपने रन्लजड़ित वख्रा-भूपणों को उतारकर उपाली दज्ञाम को दिये छोर कहा-- हे उपाली अब तुम घर को लौट जाओो ये चस्तुएं तुम्दारे निवाद के लिए चहुत हैं । लेकिन उपाली दूसरे दी प्रकार का आदमी था उसने कोटने से इन्कार किया । ये सब लोग बुद्ध के पास गए और भि.्लु चन गए फड्िय ने जब मिज्लु-धर्म प्रदण किया तो वद्द बड़ी प्रसन्नता से कहने लगा--वादद सुख वाद सुख गोतम ने उससे इसका कारण्ण पूछा तो उसने चतलाया--हे मालिक पदले जब मैं राजा था तो




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now