बिदा | Bida

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Bida by प्रतापनारायण श्रीवास्तव - Pratap Narayana Shrivastav

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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4०० चिदा इसका सवय क्या है आख़िर ? जब से वहू घर में आईं, तव से यह ऐसा हो गया है । ठीक है, उसी ने मेरे लड़के को ख़राब कर दिया। असर कहाँ जाय, है तो आख़िर ग़रीव घर की । वाप के घर में पेट-भर खाना तक नसीव न था, यहाँ पर दोनो वक्त पेट-मर खाती है, आख़िर वह सब कहाँ जायगा । जैसी खुद्‌ वरवाद्‌ हे, वैसे ही मेरे लड़के को भी कर दिया । उसे शीघ्र ही उसके बाप के यहाँ भेजना चाहिएु। उसे यहाँ की रोटियाँ लगी हैं । जहाँ तक हो सके, उसको जल्दी ही इस घर से दूर करना चाहिए, नहीं तो यह छूत शायद : रानी को भी न लग जाय । जहाँ वह गईं, तहाँ मुरारी बावू दीक हो गए । लड़की सुंदरी थी, इसलिये ग़रीब घर में शादी की, नहीं तो मं कभी न करना, चाहे उनके सात पुरखे नाक रगड़करं मर जाते । आज ही मोहनलाल को लिख दूँ कि आकर वह अपनी गुणवतती को ले जायें । आजकल के लड़के ही ऐसे होते हं कि जहाँ स्त्री का मेँह देखा कि उसके गुलाम हो गए, और अगर कहीं खूबसूरत हुईं, तो फिर कहना ही क्या है । इसी समय कुझ्ुुदिनी ने आकर पूछा---''क्या वावूजी आपसे, और यासे ऊद कहा-सुनी हो गई है ?” माधव वावृ.के क्रोध का उफान शांत हो गया था। उन्होंने कुछु- दिनी को देखकर बड़े प्रेम से कहा--“वह नालायक हैं, मेरी वात नदीं मानता)” छखदिनी ने पृः -- “च्या वात थो वावृज्ञी १ साध्व वावु ने उत्तर दिया--“छद नहीं। ऐसे ही । क्यों + भावज का व्यवहार तुम्हारे साथ केसा कै हट শিক , कैंसुदिनी-“एक तरह से अच्छा ही है, लेकिन रोज ये धिक्कारती हं 1 साधव वावू---' क्यों ??”




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