आशीर्वाद | Aashiirvad

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प्रतापनारायण श्रीवास्तव - Pratap Narayana Shrivastav

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श्रीदुलारेलाल भार्गव - Shridularelal Bhargav

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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ख्राशीवांद ११ से पूछ ले । मेंने उसे नहीं छेड़ा । रसूल पेरंबर की क़सम बेअदवी नहीं को ।” दशकों में से एक ने कहा--“हुज॒ र, छोड़ दें । ग़रीब को सताने से फ्रायदा १” में--०यह बदमाश गरारीब ओरतों की बेइज्ज़ती करता हे, छोड केसे द १! दूमरा दशक--आप भिखारिन से खद पृत्रं लीजिए, ग्रगर बह कहें कि इसने कुछ गुस्तासखरी को है, तब इसको पुलिस के हवाले कोजिए, वरना छोड़ दे । इंसाफ़ होना चाहिए ।'' मने डपटफर्‌ कहा-- “चुप रहा, मेने च्रपनी ओखां से दखा हैं, यह शख्स बराबर उसे छेड़ रहा था ।”! „ 2: १ पुलिस का सपाहों पास आ पहुंचा | युवक कॉपने जगा । ২5 ভাঁ मे पूद-परचित सोठे स्वर न कहा--“साहंब, इसका छोड़ दं, मेर कहने से छोड़ द॑ 1? मेने देखा, भिग्धारित सामसे खड़ी थों। उसके मुख पर करुणा, दया प्रर ऋूमा को छाप थी । उसके नत्रों में अब भी आँसू भर हुए थ | शायद बे क्षमा के थ | म॑ने ।पखारिनी से पूडा-- मा, क्या इसने तुम्हारा अपमान नहीं किया १” भिखारिनी--०में पहचानती नहीं । में ठीक नहीं कह सकती।




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