मनुष्य ही मन शरीर और परिस्थियों का राजा है | Manushy Hi Man, Sharir Or Pristhitiyo Ka Raja Hai

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Manushy Hi Man, Sharir Or Pristhitiyo Ka Raja Hai by केदारनाथ गुप्त - Kedarnath Gupta

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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बाह्य “र भी बगे तो उसश सतीश सदर पर धगढ ही है चाय ६1 , हो सममते हैकितुमने दुग काम शिया ई। ते « लक! नाम एक कद्ानी में यथा बात আভা नशा गरम ई है कि प्रयेत बिचार और पफ्रशश पास शा हर समय पता है जिस पर अच्छी तरह विचार विया शगो ६। इसी एले यर्‌ क्द्ा जाता है हि सुख्दार क्ामा वा सेश নাথ . নহী মানা पहता बल्कि सार समाज शझयया गशर দা মালালা देता है । নূল গ্রনি হুল থালা তর নর্পারা ঘা টন পা দনা नहीं सकते किन्तु जित पिचोरों से सम थुर ঘাস ধা দির तैयार इते हो उन विद्वाग को बदल पर तुम बुर षाम पे; नतीओी वो रेक जरूग सकते इ!। इसीलिय ऐसा पद्म जाता है कि मनुष्य का सम जरूरी कर्तव्य यइ है कि पट धरये चिच के ऊँचा बमाकर श्रच्छन्थस्छे থাম करे | बह बात सच द कि तुम इनियाली बाइरों घटमाओं षो मघे बदल सकते फरिलु अपने को ऐसा बना सकते हो कि उने হী নাই হানি নঘট্বৈ। অল্যন शरीर मुक्ति का बारण হা मनर द मीम ই। यदि. तुभ दुत सुकषान प्ति है दे इसका दोप तम्हाया ही है। तुम अपने दिचार ऐसे बनाते




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