मनुष्य जीवन की उपयोगिता | The Economy Of Human Life

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The Economy Of Human Life by केदारनाथ गुप्त - Kedarnath Gupta

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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(9५) तीसरा प्रकरण उद्योग जो दिन बांत गये थे लौटने वाले नहीं शोर जो ञआञाने घाले उन पर कोई भरोखा नहीं, इसलिये, पे मनुष्य, तुम्ये उचित है कि तू न भूत काल के लिये पश्चात्ताप फर ओर न मविष्य पर अधिक विश्यास रख, फेयल वर्तमान कएल दवा उपयोग करना झपथा लक्ष्य बना । यह समय अपना है शोर आगे चल कर क्या होगा, यह कोई जानता नहीं । धतएणव जो कुछ करना है उसे शीघ्र ही कर डाल1जों काम ध्रान कात हो सकता है उसे सायकाल पर मत छोड । आंखस फरने से आवश्यक चस्ठुय सो प्राप्त नहीं होती, जिससे भनुष्य को घह्ठत दुख द्वोता दे, परन्तु॒ परिश्रम फ्रने से आनन्द दी आनन्द मिलना है! उद्योगी को कसी वात की कमी नहीं रहती, फ्योंफि डसति और घिजय उसके पीछे पीछे चलते हैँ. । । जो कभी भी ख़ाली नहीं बैठता और श्रालस को शेत्ु खसमभता है बद्दी वनवान है,चही श्रधिकार सपध्य है, चद्दी आव- रुणीय हे श्रोर पड़े बडे राजे महाराजे उससे ही ललाह लेने की इच्छा करते हैं ! उद्योगी महुष्य मुद्द अधेरे उठता है और अ्रप्रिक रात गये स्रोता है, घद अपने मन और शरोर को भनन ओर व्यायाम डारा सशक्त बनाये रहता हे । परन्ठु आलसी महुप्य ससार की फोन चलांबे स्पथ अपने ही को भार स्परूप बन जाता है, उसका समय काटे नहीं कटता, घद् द्‌र दर भटकता फिरता हे, उसे सूक नहीं पडता




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