संस्कृत साहित्य का इतिहास | Sanskrit Sahitya Ka Etihas

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Sanskrit Sahitya Ka Etihas by बलदेव उपाध्याय - Baldev upadhayay

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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द सन्त साहिस्य का इतिहास सग्रय की नालिया दगस के गगन-सण्डल को फत्पिय कणों के लिए से ही मलिंन उौर श्न्पसरपूर्ण बाय परन्तु य्ाशाबादिता का चव्दोदय उसे छ्काश से भगन तथा शान्ति से स्नि्य सबदा बनाये रखता है। सम्स्वु मारफो के सुचान्त रूप वी चानकारा के लिख मारतठाय ढाशनिक विचारों से पर्स प सा सिसास्त झाबइय् हैं । मारतीर तत्वज्ञान मेंसश्य के मोतर से झाशु। के. सिपसि के नलर से सम्प्ि का तथा दुन्ख के शांतर से तुग्व का उदुपस झपर्पस्थाव मानता हे । रवार का पतुबसाम दुख में सही है । यह जावन व्यक्तित्व के विकास से शापरा म्वने मूपय छोर सहस्व रखता है सपर्प के सीतर से सॉख्य वी यम लिंदकना दे. सास के बीच में विजय का शखनाद घोषित होता हैं । मानव का चवन्हिक पूुता की झामिव्यक्ति से यह जीवन एक साघनमात-है । निष्ण्पच ब्रह्म की भी प्राप्ति प्रपच के सीलर से ही होती है । फलतः ससाग का व्यापक दे खे परिडव्यमास सन्ताय तया बेषम्य- सच कलेश श्रस्तनोगपया सुख में सोख्य में तथा श्रानन्द में परिणुत होते हैं । इसी दाशनिक विचारवारा के कारण लीवन के संपर् को प्रदर्शित करने पर पर भी ना का पंबणस सदा सगलसय होता है । सस्कृत में ठ स्वान्त नाटकों के निनान्त झभाव का रहस्य इसी दाशनिक स्द्वान्त में द्िपा सह्झत नादककारों के ऊरर जावन के कंग्रल साख्यपक्ष के प्रदशक होने छे एकामित्व का श्ारोप कयसपि न्पत्व्य नहीं सना था सकता 1 फाध्य जाय का पूर्ण श्मिव्यक्ति दे । सच्चा कि जीवन के सुश्बहु हो मे रमता हैं | बढ जनता के जावन का श्दुमव नर उसके मामिक स्यला को कमनीय भाषा में घ्मिव्यक्त करता दै | उसके काव्यों में ननहुदत सन्दित होता है झपेर जनता बी मूक देदना अपना ऐू् तथा. प्रभावशाली अभि यज्ञना पाता है उसकी कममीय कतिगें से । रुप शोर दु्य बृद्धि और हाप राग सर द्ेष मैची बोर विरोव के परस्पर संबर्प से उत्पन्न नानात्मन स्थिति का ही घव्म छोटा डामिवान जीवन है । इसको पूर्ण श्रमिव्यज्ना दुख का सवा 7 परिहार फर देखे पर स्या फनी हो सकती है ? क्या सस्कत का कवि नौवस के केवल सौख्यपन्न में चिघण में ही अपनी वाणी की चरिनाथता सावता है ? सरकूति तथा जनजागरणु का झम्दूव सर्द कवि तास्िण रूप से जीवन के




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