राजनय के सिद्धान्त | Rajnay Ke Siddhant

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Book Image : राजनय के सिद्धान्त - Rajnay Ke Siddhant

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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चजनय का छू सवकए शशिकास लक्ष्य एए कार्य 7 और विदेश भीति पर अध्याय 13 और राजनय तथा अन्तर्राष्ट्रीय काउून पर अध्याय 7 मे पृथक से विधार किया गया है अतः यहाँ सॉकेतिक विवेधना पर्याप्त होगी | अनेक विधारक और लेखक मनमाने रूप से 'राजनय शब्द-का प्रझेग विदेश नीति बनाने और क्रियान्वित करने के लिए करते हैं जो अनुचित है । दिदेश मीति ओर राजनय राष्ट्र की बाह्य व्यवस्थाओं से सम्बन्धित नीति के वे पहिये हैं ज़िनकी सहायता से अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति चलती है लेकिन दोनों एक दूसरे के पर्याय नहीं हैं। राजनय किरी भी देश की विदेश नीति को कार्यान्दित करने की प्रक्रिया और विदेश नीति के लक्ष्यों की प्राप्ति का साधन मात्र है। रार विक्टर वेलेजली {517 ४८107 ५/९1९5९)) के कथनानुसारं राजनय भीति नहीं है वरन्‌ इसे क्रियाग्वित करने दाला अधिकरण है | दोनों एक दूसरे के पूरक हैं क्योंकि एक के बिना दूसरा कार्य नहीं कर सकता । राजनय का विदेश नीति से पृथक कोई अस्तित्व नहीं है बरन्‌ ये दोनों मिलकर कार्यपालिका की नीति निर्धारि करते हैं । विदेश नीति द्वारा रणनीति तय की जाती है और कूटनीति द्वारा तकनीके तय की जाती है ।' ' विदेश नीति वैदेशिक सम्बन्धों की आत्मा है और राजनय वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा विदेश नीति कौ सचातिते किया जाता है | राजनयश्ञों द्वारा अपनी सरकारों की विदेश नीति के सिद्धान्त निर्षारित नहीं किए जाते किन्तु वे अपने प्रतिवेदनों द्वारा इस नीति की रघना में महत्वपूर्ण योगदान करते हैं | विदेश नीति तय करते समय राजनयक्ञों के प्रतिवेदनों को सदैव ही मूल्यवान कच्चा माल समझा जाता है । पामर तथा परकिन्स के कथनानुसार *“राजयेय एह सेवी दर्ग भौर यन्त्र प्रस्तुत करता है जिसके द्वारा विदेश नीति को क्रियान्वितं किया जाता है । इममें एक मूल तत्व है और दूसरा प्रणाली है 13 हेरल्ड निकल्सन ने वियना कप्रेस सम्बन्धी अपनी रधनां विदेश नीति एव राजनय के मध्य स्थित्त सम्बन्ध पर प्रकाश डाला ६ । उनके मतानुसार दोनों का सम्बन्ध राष्ट्रीय हितों का अन्तर्राष्ट्रीय हिताँ के साथ समायोजन से है | विदेश नीति राष्ट्रीय आवश्यकताओं की एक सामान्य घारणा पर निर्मर है। दूसरी ओर राजनय एक लक्ष्य नहीं है दरनू साधन है उद्देश्य नहीं है वरन्‌ एक तरीका है । यह बुद्धि समक्नौता दर्ता एवं हिरतो के आदान प्रदान द्वारा सम्प्रमु राज्यों के बीच सपर्ष होने से रोकता है | यह एक ऐसा अधिकरण है जिसके माध्यम से विदेश नीति युद्ध के अलावा अन्य साधनों से अपना लक्ष्य प्राप्त करने का प्रयास करती टै । राजनय शन्ति का साधन है । जब समञ्जौता करना असम्भव बन जाता है तो राजनय निष्क्य बन जाती £ ओर अकेली विदेश नीति कार्यरत रहती है ॥ उपर्युक्त विवेधन कै आधार पर यह कहा जा सकता है कि विदेश नीति और राजनय को समानार्थी रुप मे समझना गलत है । इन दोर्नों में आधारमूत अन्तर है । जहाँ विदेशनीति साध्य है राजनय उसका सापन है। लेकिन दोनों में आपस में विरोध की स्थिति महीं ई अपितु एक दूसरे के पूरक हैं। 15৮৮০০02149 টি চাআাখ আচ ভিএতা ৮30 2 ~ १5 €# 1 दकाल नणि) ऽ€तणलह १ 9 4 णन चदनि तस्थतो 28005 2. 92. ঞ:11294145695০ল তি 085০6 সাম 8 51045 মচ 8৫ 09 1812 22 ए 164




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