किरण - वधू | Kiran - Vadhu

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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किप्ण-वधू ६ ओर विष एक बडे प्रख्यात नगर के रम्य दीर्घ स्टेशन के पास--- स्टेशन, गति का निखिल रूप वह, ममता प्रीति-रीति का बञ्चक, जहाँ तृषातुर को | ¦ भी तो विना मूल्य के प्राप्पय नहीं था-- बाहर से भीतर, भीतर से बाहर को पहुँचाने वाले रेल पार कर बने मार्ग की दूर, बहिर अतिम सीमा पर নতি रहते; बालक बुद्ध और वनिता নী भूखे अमिट दया के पात्र बहुत से भीख मॉगनेवाले।




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