रंग में भंग | Rang Me Bhang

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Rang Me Bhang by महावीर प्रसाद - Mahaveer Prasad

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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বা অন [ ५९१ |] युद्ध को उच्चत हुए तत्काल राना भी बहा रो स्का वीर फो स्मणी-स्मरण रण से नहीं । घ्न्य शो, तुम धन्य द्‌}, शरप्रली सीसोदिया, সাহা रहते तक जिन्होंने वंशब्रत पालन किया | [ ५२ |] जान जामाता बहुत घरसिंद ने रोका उन्हें, ओर शीतरू-दृष्टि से सप्र म अवजोका उन्हें | নিত तत्दण ही उन्हें यह हो गया मासित वहाँ, एक बार बहा जहां फिर सिन्धु स्ता है कहाँ ९ [ ५३ 1 अन्त में संग्राम में वीरत्व दिखला कर महा, वर-समेत बरातियो ने वीर-गति पादे वद ! शूर कन्या-पत्त क भी हत अनेक हुए तथा, हानि दोनों ओर की होती कल्दू मे सर्वेधा || | {| अन्य सेवक आदि जन्म व*-पक्त के जो बच रहे, वचन নুঘ वरसिंह ने उनसे अमयदायक कहे । त्राण ही करा सदा शरणागता का वीर है, प्रोम-वैर श्रयोग्य से रखते कदापि न धीर हैं || १६




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