पराशर संहिता | Parashar Sanhita

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Parashar Sanhita by अज्ञात - Unknown
लेखक :
पुस्तक का साइज़ :2.94 MB
कुल पृष्ठ :62
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अज्ञात - Unknown

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नवमसो ध्याय । ९ परिघत््त य तेघां थे सचसयुणितिय्वपि ॥ २९ . चघा काछमयो हस्ती यघा चम्स मयो ग्टग 1 नामधारका ॥ र३ ... य्रामस्थानं यघा य्यून्य यथा कूपस्तु निच्लैल । यथा हुतमनसो च व्यमन्त्रो श्नात्मणस्तथा ॥ २४ यघा स्त्रौपु था गौंस्टघराफला | यथा दान तथा 1 २४ चित्र कम यघाने कैर डी रुन्सील्यते शरगें । तदत स्यातु संस्कार वि धिपूर्स के ॥२६ ग्रायन्वित्त प्रथच्छन्ति ये हिला । ते समेता नरक ययु ॥ २७ थे पठन्त दिना वेद ये । दे लोवयं घारयन्त्य ते पर्स ॥ रुप सस्प्रगीत श्सशानिषु दौप्नोइसि सव्वभचाक । तथेवर नानवानु विष सरमभक्त झ ॥ २४- व्यरमेध्यानि च सम्नाणि प्रच्तिप्र्सुद्दके चघा । तथेत्र किस्लिघं सँ्नें प्रचेप्रदां दिजेएसले ६ ३० गायतबीरितो विप्र स्वादप्यशुचिभंवेतु । गायब्रीब्रस्मतत््तज्ञा सस्यूच्जन्ते दिजोत्तमा। ॥ ३९ डु शौलीईपि दिज पूज्यो न । कः परिद्यज्य दुष्ठां गां दुद्देच्छोलवतीं खरीम्‌ ॥ ३२ घम्म वैदखड्गधरा दिला । ज्रौड़ार्धमपि यदुन्रूचु स धर्म परम सदत ॥ ३६ वातुव्व दोईवि कल्पी च पाठक । सुख्या परिषत्‌ स्पुदेशावरा ॥ ३० राज्ञाचाकुमति चैव प्रांयच्चित्त दिजो बढ़ेतु । स्वयमेव न वक्त प्रायश्वि्तस्थ निष्वुति ॥ ४. न्नात्मर्था् व्यतिक्रम्य राजा यतृ करत मिच्छति । तवु पापं शतधा सूत्वा रानानसुपगच्छति ॥ ३६ प्रायस्थित्त सदा ददा।इवलायतनाखत । व्यात्मान पावयेतु पप्नावनपनु वे वेदमातरम ॥ ३७ सिख वन छृत्वा त्िसन््यमवगाइनमु । गवां गोछे दिवा ता समजुनजेतु ॥ ३८ उ्णा व्घ॑ति-शौते वा मारुते वाति वा स्टशम्‌ । न कुर्वोताह्मनस्त्र णं गोरछात्वा तु शक्तित ॥ दुध व्याह्मनो यदि वान्येषा चेत्र एय्वा खले । मच्षचन्तीं न कथयेत पिवन्तप्लेव वत्सकमु ॥ ४० पिवन्तीप् पिवेत तोय॑ संविशन्तोषु संविशेतृं । पतितां वा खलप्रारी रेत ॥ 8४ गवाधे वा वस्तु प्राणान परित्यजेतु । सुच्यते न्नषम-ह्व्यादौर्गोप्ता गोन्नाझणस्य च ॥ ४३ गोवधस्याबुसूपेण प्राजापत्य । प्रानाप्यन्तु यत॒ु झ्नच्छ विभजेतु ॥ ४६ रकान्षमेकभक्ताशी सका । व्यरयाचिताश्यकमछरेकादँ सास वाशन ॥ 88 दिनवयच्षे कभक्तो दिदिये नत्ताभोजन । द्नदवभवाची स्यातु लिदिनं ॥ 89. त्िदिनयोकभक्ताशी लिदिन नत्तभी जन । दिनलयसयाची स्वातृ त्रिदिनें सारताशन ॥ 8६ चतुरदचन्तत कम क्ताशी चतुरष्ें नक्तभोजन । चतु्दिनिमयाची स्ताचतुरक्ते सारताशन ॥ ४9 प्राथ्चिसे ततस्वीण । विप्रांथ दच्तिणां पवित्नाणि जपेद्िज । न्नाझणान्‌ भोजयित्वा तु गोन्न शुद्लो न संशय ॥ ४3 इति घाराशरे घम्स शास्त्र च्य मो ध्याव ॥ ८ ॥ पिन नवसीःध्याय । गवां संरक्षणा्धाय न दुष्येद्रोधवन्वयो । तदधन्तु न त॑ विद्यात्‌ तथा ॥ ९ व्यज्भुमात स्यूलो वा घ्रमाणत । द्याइस्तु सपलाश्व दण्ड इत्यमिधीयति ॥ २ दण्डाटूसे यदन्यन प्र्रेदा निपातयेतु । प्रावस्वितत चरेत प्रोक्त दिगुण शोनतव्वरेत ॥ डू रोधवन्वनवोक्ता।खणि.वातनप्र चतुल्विधम । रकपादं चरेद्रोधे दिपादं बन्घने चरेतु ॥ 8 योक्ती पु पादचौनं स्पा रेत सत्वे निपातने । गोचरे च सच्चे वापि दुगप्वप समेव्वपि ॥ ५. नदौय्वपि ससुद्ेधु खाते८प्यय दरोसुखे । दग्चदेपरी स्थि पा गावस्तम्मनादोध उच्चते ॥ हू ..




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