ऋग्वेद संहिता [भाषा भाष्य] [पंचम भाग] | Rigved Sanhita [Bhasa Bhasya] [Part -5]

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Rigved Sanhita [Bhasa Bhasya] [Part -5] by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( १५ 9 ष রি स्री-पुरुषो के कर्चव्य | जितेन्द्रियों के कत्तच्य । ( १३ ) दिन-रात्रिवत्‌ पत्ति-पत्नी जनों के कर्तव्य | ( २१-३२ ) भावी जामाता के अति आदर । ( २६-२७ ) प्रसु से रेश्वयं की याचना 1 ( पर ४०९४६१९ ) सू° [ २७ ]--क्तानी पुरुप का पुरोहित पद्‌ पर स्थापन । विद्वान से ज्ञान की याचना । नाना प्रकार के उत्तम वीर विद्वान्‌ पुरुषों के कर्चज्य । (५१ ) राजा के कर्तव्य 1 ( १२ ) विद्वानों के कर्तव्य । ( १५ ) राष्ट्र कते प्रति उनके कत्तेन्य 1 ८ प° ४१९-४२८ ) सु° [२८] -३र देवगण | राष्ट्र के ३३ प्रसुख शासक | (२) वरुण, मित्र, अर्यमा । तीन प्रधान पद्‌। उन के कत्तव्य । (प° ४२८-४२९ ) सू° [ २९ ]-- विश्व के एक, द्वितीय अध्यक्ष का वर्णन । उसके महान्‌ अद्भुत्त कर्म । (८ ८-९ ) जीव जर प्रयु का प्रकृति के साथ वर्णन | ८ प° ४२९-४३२ ) सू० [ ३० |राष्ट्र में प्रजा जनों के सदश जीवों का वणन । ( २-४ ) राष्ट्र-शासक रूप ३३ देवों का वर्णन! उनसे रक्षा की प्रार्थना । ( प° ४३२-४३४ ) सू० [ ३६ ]-यज्ञष और यज्ञमान की प्रशंसा । उस के क्त्य । ( ६-७ ) पक्षान्तर सें राजा के प्रजा के प्रति कर्तव्य । ( ४ ) प्रजावती, खी की अभि से तुलना । (७ ) पति-पत्नी के कत्तंव्य । ( ३०-३१ पूषा परमेश्वर से पाथना । (१२-१४ ) विद्वानों से प्रार्थना ॥ ( १५- ६८ ) उत्तस प्रभु भक्त का प्रभाव । यज्ञशील का वैभव, बल: जोर सामव्य 1 ( प्‌० ४३४-४४० ) तृतीयोऽध्याय এরা উদ [३२ ]--विद्दान्‌ पुरुषों के कर्तव्य का उपदेश । (२) ज्ञासक के शुण 1 ( ३ ) विद्युत्वत्‌ सेनापति वा राजा के कर्तव्य । शतु-विजय का दश । (६) व्यापार का उपदेश | হালা জা জী কহ करे)




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