आश्रम संहिता | Aashram Sanhita

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Aashram Sanhita by काका साहब कालेलकर - Kaka Sahab Kalelkar

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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भारतसेवक गोखलेका सेवाश्रम : ७ यथासमय गाधीजीने ऽलाण्डा1४ ०12 3०लंधए को आधिक और अन्य मदद की । लेकिन अुस सस्थाके साथ गाघीजी मेकरूप नही हो सके । गाघीजीने देशसेवा करनेका तरीका सीखनेके चिमे ओर प्रत्यक्ष देगसेवा करने के छिञे' सत्याग्रहाश्रमकी स्थापना कौ 1 स्थापनाके पहले भुन्होने अपने विचार नेक योजनके रूपमे छापकर देशके प्रमुख नेताओं के पास भेज दिये आर बुस पर मुनक सम्मतियां मौर रचनात्मक टीका-टिप्पणी मांग ली । गाघीजोकी कल्पनाका दो-तीने प्रान्तोके रोगोने स्वागत किया भौर ञुन्दे आमन्त्रण भी दिया । गाधीजीने सोचा कि “मैं जन्मसे गुजराती हूँ । देशसेवाका प्रारम्भ गुजरातसे और गुजराती भाषाके द्वारा करू और गुजरातका पं सा राष्ट्रसेवाके लिये लगाओँ |' आाश्रमकी स्थापनाकी जव चर्चा चल रही थी तव मैने अन्हे सुझाया कि अहमदावाद नहीं, किन्तु अहमदाबाद भीौर वम्चबीके बत्च सुरतके आसपास कही आश्रम खोलना अच्छा होगा । मेरी सूचना विचार करने योग्य है, जितना तो अून्होने कहा । लेकिन वस्त्र-निर्माणके भारत के प्रधान केन्द्र, अहमदावादमे हा आश्रम खोलनेका मुन्होने निश्चय किया । और अहमदावादके पास, सावरमताके अस पार कोचरव नामक गाँवमे वेंरिस्टर जीवणछालका येक वगला किराये पर लेकर अन्होने आश्रमकी स्थापना की । तुरन्त दूसरा मेक पडोसका वगला भी किराये पर लेकर आश्रमके वस्तारके लिअ अनुकछता प्राप्त की । जिस तरहसे भारतेमे गाघीजीका आश्रमी प्रयोग शुरू हुआ । राष्टूसेवाके जिओ माश्रम-जीवनकी नितान्त सावदयकता है, जिसका साक्षात्कार गाघीजीकों दक्षिण आाफ़िकामे ही हुआ था । भौर जैसे दो प्राथमिक प्रयोग अुन्होने वहाँ किये भी थे । जुनके जिक्रके विना सत्या- ग्रहाश्चमके प्रारेम्भका खयाल ठीक नही हो सकता ।




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