जयपुर खानिया तत्त्वचर्चा | Jayapur Khaniya Tattvacharcha

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Book Image : जयपुर खानिया तत्त्वचर्चा - Jayapur Khaniya Tattvacharcha

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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का £ ओर उसका समाधान ३७९ उसकी चावित ग्यवितरूपमे तही आ सकती, जिसके हारा शक्ति व्यक्तिरूपमें भातो है या जिप्तके विना शक्ति व्यकवितरूपमें नहीं आ सकती वही वहिरग कारण या निमित्त कारण ह या वहो बलाधान निमित्त ह । यह ठीक है कि लोहा ही घडीके पूर्जोकी शक्ल घारण करता है। यह भी ठीक है कि लकडी या लोहा ही विविध प्रकारके फर्नीचरके रूपमे परिणत होते ह । यह भौ ठीक ह कि मेटीरियन्से ही मकानका निर्माण होता है | यह भी ठीक हैं कि विविघ प्रकारके रसायनिक् पदार्थपरिं ही विभिन्न प्रकारके अणुत्रम आदि बनते हैं, किन्तु ये वस्तुएँ जिन मनुष्यो या कलाकारोके द्वारा विभिन्न रूपको धारण करती हैं, यदि वे न होवें तो वैसा नही हो सकता, मनुष्य या काकार ही उनको उन उन खूपोमें छानेसे सहायक होते हैं यही उनका वलाधान निमित्तत्व ह । कठाक्रारका अर्थ हो यह हैं कि वह उसको सुन्दर रूप देवे । यहं कार्यं मनुष्यसे भौर केवल मनुष्यसे ही सम्भव ह । जहां तक मेंटीरियलकी बात ই वह तो सुन्दर ओर मही दोनो ही प्रकारकी वस्तुओमें समानरूपसे रहता है ! धडियोके मूत्योमें तरतमता लोहेकी बात नही हं, किन्तु मुख्यता निमति कला- कारकी हूँ । प्राचीन नाटय साहित्यकार भरतमुनिने अपने नाट्यशास्त्रमें रसक्रा लक्षण करते हुए लिखा है कि-- विभावानुभाचव्यभिचारिसयोगाद्‌ रसनिष्पत्ति । इससे स्पष्ट हैं कि मानव हुदयमें विभिन्न प्रकारके रसोकी उत्पत्ति ही बहिरग साधनोकी देन हं । यदि कभी सिनेमा देखनेवालेसे पूछा जाय कि खेल कैसा था तव वह जो उत्तर देगा वह विचारणीय हैं । इसी प्रकार आत्मीय जनकी मृत कायाका देखना, बाजारोमें घूमते हुए सुन्दर सुन्दर पदार्थोकोी देखना आदि व्यावहारिक वाते हं जिनपर गभीर विचारकी जरूररत ह । क्या सिगेमा्मे जो कुछ भी सुनने या देखनेमें आता है वह व्यर्थ है या वही देखनेवालेके हृदयोको प्रफुल्लित करनेमें सहायक होता है ? आत्मीय जनकी मृत कायाकों देखना व्यथ हैं और जो शोक টা ই মা হাল उत्पन्न करनेमें वह सहायक है ? यही बात बाजारू चीजोके सम्बन्धर्में चिन्ततोय हैं । जैन तत्त्वज्ञानका विद्यार्थी यदि ज्ञान और ज्ञेयके रूप पर तथा विषय ओर कृषायके रूप पर विचार करेगा तब उसको मालम होगा कि यह पर , पदार्थ ही केवल जो ज्ञेय न रह कर विपय बन जाता है और आत्मामें कपाय उत्पन्न करा देता है, ऐसी स्थितिमें भी आश्चर्य है कि हमारे आध्यात्मिक महापुरुषोका ध्यान इसकी तरफ नही जा रहा है । इस विषयमें महपि समन्‍्तभद्र, अकछक ओर विद्यानन्दकी मान्यताएँ मनन करने योग्य है--- दोषावरणयोहानिनिरकेषस्त्यत्िशायनात्‌ । क्वचिद्यथा स्वहेतुस्यो वदिरन्तमलक्षय ॥४॥ इस कारिकाके द्वारा स्वामी समन्तभद्र कहते हैं कि किसी आत्तमाम्में दोष ( अज्ञानादि विभावभाव ) तथा आवरण ( पुदगल कर्म ) दोनोका अभाव ( ध्वस ) रूपसे पाया जाता है, क्योंकि उनके हानिक्रममें भ्रतिशय ( उत्तरोत्तर अधिक ) हानि पाई जाती है। जो गुणस्थानोके क्रमसे मिलती है | जैसे सुवर्णमें अग्निके तीव्र पाकद्वारा कीट व कालिमा अधिक अधिक जलती है तो वह सोना पूर्ण छुद्ध हो जाता है । कारिकाकी व्याल्या लिखते हुए शकाकी गई है कि आवरणसे भिन्न दोप और क्या वस्तु हैं ? दोषको आवरण ही मान लिया जावे तो क्या हानि हं? तव भकलकदेव उसका समाधान करते हुए किते हैं---




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