जैनहितैषी मासिकपत्र भाग - 8 | Jain Hitaisi Masik Patra Bhag - 8

5 5/10 Ratings.
1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Jain Hitaisi Masik Patra Bhag - 8 by नाथूराम प्रेमी - Nathuram Premi

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about नाथूराम प्रेमी - Nathuram Premi

Add Infomation AboutNathuram Premi

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
१9 होगे | जनेउकों हम कंघेपर रखते हैं । इसका आशय यह है कि हम उक्त तीथकरोके कहे हुए चाक्योंको अपने कंघेपर विचारके लिये रखते हैं और उनपर नित्य अमल करते हैं । यह इस बातका सूचक है कि, हमारे तीमेकरोंने जो कुछ उपदेश दिया है. उसको मानने भर उसपर अमल करनेके लियं हम तयार है नेनियाका एक आर आकार मधबविन्दकका है। भारतवषक प्राय: प्रत्येक भागके नेनमन्दिरोमें उपड्के लिये बड़े ९ कमरे रहते हैं । ओर उन कमरोंकी दीवालॉपर बढतसी तसवारें रहती हैं | मैं जब आठ वर्पका बालक था. तब अपने पिंताके साथ जैन- साधुजोंका उपदेश सुननेके जाया करता था । एक दिन हम वहां आधा घंटा पहिले पहुंच गये, इसलिये यथेष्ट समय मिल जानेसे मैंने दीवारोंकी तसचीरोंपर बड़े श्यान ओर साकसे नजर डाली । एक तमसबीर जिसने से रे स्यानका विजेपरूपस आकर्षित किया. इस प्रकारकी थी. एक आदमी कुएके बीचम उसके पास ही उगे हुए शास मद: ग्हा कण्के किनारे एक बडा हाथी खड़ा दुआ है, नी लटके हुए जादमीकों नहीं पा सक- नेकें कारण जपनी सूंड बूक्षकों इसलिये हिला रहा हैं कि पटक डू । कुण्की दीवारॉपर नीचकी आर चार सांप, लटक हुए मनुप्यकों काटनेकी गरजमे ऊपरकों फण कर रह हैं । नीनें नलीमें एक और बड़ा सांप उस मनुप्यकी ओर मुंह फैलाए हुए हैं | मनुष्य जिम झाखाकों पकड़कर लटक रहा है, उसे एक काला + दिगम्चर सम्प्रदायके जनऊकों सम्यरदयोन - ज्ञान-चारित्ररूप रत्नन्रयका चिह माना हं । किसी आचायने उपयुक्त प्रकारसे तीन चौवीसि- पाका प्रगट करनेवाला माना है या नहीं, हम कह नहीं सक़त 1 सम्पादक




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now