प्रज्ञापनासूत्र भाग - 1 | Pragyapana Sutra Bhag - 1

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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सहित्णुता के महासागर वीरता, घीरता तथा सहिष्णुता के झभापश्री महासागर थे । भयकर से भयकर सकटकाल में भी आपको किसी ने परेशान नहीं देखा । एक बार लुधियाना मे श्राप की जाघ की हड्डी टूट गयी, उसके तीन टुकड़े हो गये । लुधियाना के क्रिश्चियन हॉस्पीटल मे डा वर्जन ने आपका झॉपरेशन किया। प्रॉपरेशन-काल में आपको बेहोश नहीं किया गया था, तथापि आप इतने शांत और गम्भीर रहे कि डा वर्जन दग रह गये। बरबस उनकी जवान से निकला कि ईसा की शान्ति की कहानियाँ सुना करते थे, परन्तु इस महापुरुष के जीवन में उस शान्ति के साक्षात्‌ दर्शन कर रहा हूँ। जीवन के सध्याकाल में श्रापकों कैसर के रोग ने ग्राक्रान्त कर लिया था। तथापि श्राप सदा णान्त रहते थे। भयकर वेदना होने पर भी भापके चेहरे पर कभी उदासीनता या व्याकुलता नहीं देखी । लुधियाना जैन बिरादरी के लोग जब डॉक्टर को लाए और डॉक्टर ने जब पूछा --महाराज, श्राप कोक्या तकलीफ है ? तब भ्राप ने बडा सुन्दर उत्तर दिया ! भाप बोले- डाक्टर साहब । मुझे तो कोई तकलीफ नहीं, जो लोग झाप को लाए है, उनको प्रवश्य तकलीफ ই । उनका ध्यान करे । महाराजश्रीजी की सहिष्णुता देखकर सभी लोग विस्मित हो रहे थे और कह रहे थे कि कैसर-जैसे भयकर रोग के होने पर भी गुरुदेव बिल्कुल शात हैं, जैसे कोई बात ही नही है। प्रधानाचार्य पद বিজ २००३ लुधियाना में श्राप पजाब के स्थानकवासी जैन श्रमण सघ के श्राचायं बनाए गण श्रौर वि स २००९ में सादडी में झापको श्री वर्धभान स्थानकवासी जैन श्रमण सव के प्रधानाचार्य पद से विभूषित किया गया । सचमुच आप का वेदुष्यपूर्ण व्यक्तित्व यत्र, तंत्र और सर्वत्र ही प्रतिष्ठा प्राप्त करता रहा है। क्या जैन, क्या भ्रजैन, सभी श्रापकी भ्राचार तथा विचार सम्बन्धी गरिमा की महिमा को गाते नही थक्तेये। प्राजभी लोग जब आपके अगाघध शास्त्रीय ज्ञान की चर्चा करते हैं तो श्रद्धा से कूम उठते हैं । सफल प्रव्धनकार प्राचाये-प्रवर अपने युग के एक सफल प्रवक्ता एवं प्रवचनकार रहे है| शास्त्रीय तथ्य एवं सत्य ही प्रापके प्रवचनों का श्राधार होते थे । उनसे हृदयस्पर्शी ठोस तस्व श्रोता को प्राप्त होता था ।प जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, श्री प्रतापसिंहं करो, श्री भीमसेन सच्चर प्रभृति राष्ट के महान्‌ नेताश्रो न भी भ्रापके प्रवचनौ का लाभ लिया था। सचमुच भ्रापकी वाणी मे निराला माधुयं था, सरलता इतनी कि साधारण पढ़ा-लिखा व्यक्ति भी उसे ्रच्छी तरह समभ लेता था । प्राषके मगलमय उपदेण श्राज भी जनजीवन को नवजागरण का सन्देश दे रहे हैं । श्रात्म शताब्दी वर्ष वि स २०३९ भ्रापका जन्म शताब्दी वर्ण है। यह पावन वर्ष है। ऐतिहासिक है। यह वर्ष विधेषरूप से पूज्य गुरुदेव के चरणों मे श्रद्धासुमन समपित करने का है । स्व गुरुदेव की जीवन की महान्तम उपलब्धि थी--जैन आगम साहित्य का विद्वानों तथा सर्वेकाधारण के लिए उपयोगी सस्करण | यही उनकी हादिक भावना थी कि जैनआगमज्ञान का यथार्थ प्रसार हो, जन-जन के हाथो मे श्रागमज्ञान की मूल्यवान्‌ मणिया पहुँचे । ग्रुरुदेव श्री की इसी भावना को साकार रूप देने हेतु मैंने प्रशापना सूत्र का भ्रनुवाद-विवेचन करने का दायित्व लिया है| अपने श्रद्धेय गुरुदेव के प्रति यही मेरी श्रद्धाञजलि है । [प्रथम संस्करण से ] -शान मुनि [ १६ )




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