हिंदुस्तान की समस्याएं (१९५०) | Hindustan Ki Samsyayen (1950) Ac 4441

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Book Image : हिंदुस्तान की समस्याएं (१९५०) - Hindustan Ki Samsyayen (1950) Ac 4441

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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ন্‌ हिन्दुस्तान की समस्‍यायें इनका हल निकालने में आसानी पैदा करती हैं । या नहीं ! इसलिए बीच के काल के बारे में सिफे इतना ही कहा जा सकता है कि ऐसा एक बीच का जमाना जरूर होता है और इस वक्त हम उसी जमाने में होकर गुजर रहे हैं। लेकिन यह तो भविष्य ही बतला सकता है कि तरक्की व्यवस्था के जरिये होगी, या आपस के समभौते से; धीरे-धीरे या तेजी से | हिन्दुस्तान में काग्रेंस और कुछ उससे बाहर के दलों ने सलाह दी हे कि इस समस्या के राजनीतिक पहलू के सुलकाने का टीक और प्रजा- तंत्रीय तरीका यह है कि एक राष्ट्रीय पश्चायत (कास्टीटप्ूएएट असेम्बली) हो । यानी, बुनियाे तरीके से हिन्दुस्तानी ही हिन्दुस्तान का विधान बनावे । वे इस बात को नही मानते कि हिन्दुस्तानी विदेशी हुकूमत के, जहाँतक विधान बनाने का सम्बन्ध है सिफ मुंह देखनेवाले एजेश्ट भर रहें । दिन्दुस्तानिर्यो की इच्छा को मूर्चरूप देने का तरीका सिप यह है कि एक राषटरीय पञ्चायत बनाई जाय । श्राज यह बात मुमकिन नहीं ই, জিদ इसलिए कि यह तब तक व्यवहार मे नहीं श्रा सकती जबतक कि व्रिटिश- सरकार हिन्दुस्तान में अपनी हुकूमत का खात्त्मा नहीं कर देती और हिन्दुस्तानियों को ही अपना विधान बनाने के लिए आजादी नहीं दे देती । ब्रिट्शि-सरकार एेसा करने का इरादा करे या न करे, घटना-चक्र से यह बात हो जायगी, क्योंकि राष्ट्रीय पञ्चायत के बननेकेबाद्‌ ही हिन्दुस्तान से त्रिटश हकूमत का खात्मा हो जायगा । पञ्चायत से मतलब तथाकथित नेतारो के दल से नहीं है, जो इक होकर विधान बनायें | इस पञ्चायत के पीड विचार यह है किं बालिग-माताधिकार के जरिये उसका चुनाव हो । उसमें आद्म: भी हों, और औरतें भी हों, जिससे वास्तव में जनता का प्रतिनिधित्व हो सके और जनता की च्रार्थिक जरूरतें पूरो कराई जा सकें। मौजूदा कठिनाई तो यह है कि उच्च मध्य- वगं के आदमी बैठ जाते हैं और आर्भिक पहलुओं से विचार करने के बजाय नये विधान के पदों के सवाल पर विचार करते हैं कि उन पर




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