धर्म और धर्मनायक | Dharm Aur Dharmnayak

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Book Image : धर्म और धर्मनायक - Dharm Aur Dharmnayak

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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धमन श्चौर धर्म नायक ] जवाहर-किरणावली [७ कोई थी खत्यपुरुष ऐसे दषित आम से स्थिर चास नहीं कर सकेगा और जब तऊ प्रत्येक गांव में ऊम से कम्म एक सन्सार्ग- प्रद्शक- प्रामतायक न दगा तव तक्र प्रामव।मियों में मद्धसं के प्रति अमिरुचि उत्पन्न न हो सकेगी । जदं मद्धमके प्रति अभिरुचि नहीं वहां सभ्यता या सस्कृति की रक्षा भी नदों होदी । सभ्यता दी रक्षा के लिए प्रामधर्म की आवश्यकता दोती है । क्योकि सभ्यता का उद्रवस्थान आमधर्स है। अतणव जहाँ ग्रामधर्स की रक्षा नदीं की जाती वहाँ सभ्यता या संसृति की सुरक्षा भी नदी दो सकती 1 नायं देशोमें मासघमै के अभाव के कारण सभ्यता भी नहीं होती और इसी फार्ण असभ्य श्रनाये देश में साधु -सतों के बिहार का भगवान ने निषेध किया है । प्रत्येक ग्राम में सन्मागेदशैक अथवा मुखिया की खास आव- ' श्यकता होती है । मुखिया रुष दी ग्राम-निवासियों को धर्म- अधमे का, सत्ये-खसत्व का, सुख-दुख का सघा ज्ञान कराता और बी उन्हें सदूधम का उपदेश देकर मन्मार নং चलांता है । केशी श्रमण जसे चार ज्ञान के स्वामी ने चिन्त वान जसे मन्मा्गदरशैक की भरेरणा से प्रदेरी राज! को सदूवसी का उपदेश देकर धमे का श्ज्युतमी बनवा धा 1 आज दइसारी दशा बिलकुल विपरीत है। हम लोग साधु पुरुषों को सदूधमे का उपदेश देने की प्रेरणा करने के बदले उनकी प्रशंसात्मक स्तुतियों से उन्हें प्रसन्न करने की चेष्टा करते हैं। और जव चित्त प्रधान के समान सन्मागेदशंक बनने का काम सिर 1




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