भारतीय कविता | Bharitya Kavita

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Bharitya Kavita by पंडित जवाहरलाल नेहरू -Pt. Javaharlal Neharu

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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अूसमिया सहस्र मृत्यु फे बाद काल के वक्ष से भास-भास कर मेरा जीवन इस पार में ठहर गया कितने सैकड़ों क्षणों निरमिषों के दल भेरे जीवन के गीत बन्द हो गए स्तब्धता की अधेरी गुफा में । याद आती है शायद, वीन-से युग में समाप्त हुआ पक्षी के मुंह का क्छोलित प्रभात-संगीत | उड़ गई गान गाते-गाते । उड़ती हुई समय की चिड़िया और अब वह वापस नहीं आयगी मेरी कामना का कोमल उद्यान सूखकर क्षार हो गया य्ह महीं है बसन्त का कोमल ईगित ] अब बहुत देर हो गई समय की असहनीय जड़ता है अब तो वापस नहीं आयगा उस दिन का प्रभात स्वप्मलीन यीवन के स्वार मे छाल-भनीछ पाल फैला हुआ रंगीन सुहत |




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