मानवी | Manvi

55/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Book Image : मानवी  - Manvi
[adinserter block="2"]

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about ठाकुर गोपालशरण सिंह -Thakur Gopalsharan Singh

Add Infomation AboutThakur Gopalsharan Singh

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
मानवीहे शृज्ञामयों शोभा तू,करुणा की हमजोली । रहती रै वात्सल्य-भाव केरस से भीगी चोली । तेरे प्रेम-स्पश से पुलकितआँख जगत ने खोली । पर तो भी रह गई अभी तकनिद्रित दी तू भोली!हे स्वामिनी नगत के उर कीप्रेम - राज्य की रानी । युग - युग ॒के अगणित शो कीतू हे कर्ण कहानी | पानव-कुल को शक्ति - दायिनीत्‌ है भव्य भवानी बनती है तू विश्व-विजयिनीले आँखों में पानी।रोते हुए क्षुधित जग-शिश्षु की हे माता कटयाणी । सदा न्याय - रक्षा के हित तू हे रण में वीराणी । २শি




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now