संगीत - शास्त्र | Sangeet Shastr

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Sangeet Shastr by के. वासुदेव शास्त्री - K. Vasudev Shastri

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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पहला परिच्छेद शास्त्रावतरण संगोत का दाद्दार्थ सम” (सम्यक्‌) और “गीत दोनो शब्दों के मिलन से सगीत शब्द वनता है । मौखिक गाना ही “'गीत' है। “सम” (सम्यक्‌) का अयं॑ है अच्छा । वाद्य और नृत्य दोनो के मिलने से ही गीत अच्छा चन जाता है-- 'गीत वाद्य च नृत्य च श्रथ सगीनमुच्यते ।' हम आज सावारणतया केवल 'गीत' या 'गीत' और “वाद्य को ही सगीत कहते हैं। इसलिए प्रधानत गीत भौर वाद्य पर ही इस पुस्तक में 'सगीत-थास्त्र' थीर्पक के अन्तर्गत विचार किया जा रहा है । संगोत की प्रशासा मगीत आनन्द का आविर्भाव है। आनन्द ईश्वर का स्वरूप है। सगीत के द्वारा हो दु ख के लेश तक से भी सम्बन्ध न रखनेवाला सुख मिलता है। दूसरे विपयों से होनेवाले सुखो के आगे या पीछे दु ख की सम्भावना हैं परन्तु इस दु खपूर्ण समार से सगीत एक स्वर्गावास है । सगीत के ईय्वर स्वरूप होने के कारण जो लोग संगीत का अम्यास करते हैं वें तप, दान, यज्ञ, कर्म, योग आदि के कप्ट न झेलते हुए मोक्षमाग तक पहुँचते हूं। योग और जान के सर्वश्रेप्ठ आचार्य श्री यान्वल्क्य कहते है-- “'वोणावादनतत्त्वन- .. श्लुतिजातिविशारद 1 तालज्ञइचाप्रयानेन मोक्षमार्ग प्रयच्छति 11” -याज्वत्वयस्मृति । सगीत्त योग की विशेषता यह है कि इनमें साब्य और सावन दोनों हो सुखरूप हूँ।




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