हिन्दी निबन्ध लेखन | Hindi Nibandha Lekhan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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१४ निबन्ध-लेखनके लिए ग्रध्ययत और निरीक्षण ये दो बड़े साधन हैं।केवल अध्ययत और निरीक्षण के बल पर सब प्रकार के निबन्ध लिख पाना सम्भव नहीं है। कुछ निबन्ध विचार-प्रधान होते हैं। उनमें मनन' की विशेष झाव- दयकता होती है। मनन का अर्थ है, किसी समस्या या गम्भीर प्रदतं पर विचार करके उसका उचित समाधान ढूंढ़ने का प्रयत्न करना, समस्या को उसके सब पहलुग्रो की हृष्टि से समभन क प्रयत्न करना । इसीको चिन्तन भी कटा जाता ट । विचारात्मक निवन्धों म मनन ग्रौर चिन्तन का महत्व ग्रध्ययत और निरीक्षण से कम नहीं है । |इतना तो हुआ सामग्री के सम्बन्ध में, जो निबन्ध की ग्रात्मा है, किन्तु आत्मा के साथ-साथ निबन्ध का शरीर भी सुन्दर होता चाहिए और वह शरीर है भाषा और रोली । भाषा ग्रौर शैली के सम्बन्ध में कुछ भी तिश्चित नियम नहीं बनाया जा सकता | प्रत्येक लेखक को भाषा और होली अपनी-अपनी योग्यता, प्रतिभा और रुभान के श्रतुसार अलग-अलग होती है । कुछ लोग सीधी और सरल भाषा में विषय को प्रस्तुत करते हैं, जबकि दूसरे लेखक भारी-भरकम कठिन शब्दों के प्रयोग को पसंद करते हैं। उनका विश्वास है कि ऐसे शब्दों के प्रयोग द्वारा वे अपने मनो- भावों को कहीं अधिक ग्रच्छे और सूक्ष्म रूप में प्रकट कर सकते हैं । कुछ लोग अ्पती वात को सीषे-सादे ढंग से ग्र्थात्‌ अभिधा द्वारा कह देते हैं, जबकि दूसरे लोग उसे कुछ श्रुमा-फिराकर कहते है, जिससे उसमें भ्रधिक बल और चुटीलापन ্সা जाता है। साहित्य में इस ब्रुमा-फिराकर कहने के ढंग को लक्षणा ग्रौर व्यंजना- शक्ति का प्रयोग कहा जाता है। मुहावरे भी अधिकांशतः लक्षणा और व्यंजना के ही प्रयोग हैं । |जब तक लेखक को लेखन का पर्याप्त ग्रभ्यास नहीं होता, तव तक उसकी रैली परिपक्व नहीं होती । परन्तु अभ्यास के साथ-साथ प्रत्येक कुशल लेखक की एक अलग श्रपनी ही शेली पुष्ट होती जाती ह ग्रौर यदि बहुत ही भ्रच्छा लेखक हो, तो हम उसको रचना को देखते ही बता दे सकते हँ कि यह रचना अभुक लेखक की प्रतीत होती है !प्रतिभाशाली लेखक की शैली का रूप बहुत कुछ उसकी प्रतिभा द्वारा नियत




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