नारेश वाणी भाग 1 | Nanesh Vani Bhag 1

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
6 MB
कुल पष्ठ :
178
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)ऐसे जीए (माग-1) /23जब आज के वैज्ञानिक मन की कोशिश से हजारो मील दूर रहने वाले
व्यक्ति को प्रमावित कर सकते हैं तो क्या उस शक्ति से आत्मा प्रमावित नही
होती ? बल्कि यो कहना चाहिए कि दूसरा व्यक्ति बाद मे प्रमावित होगा,
पहले उसकी खुद की आत्मा प्रमावित होगी | जिस मालिक के लिए नौकर
फूल तोडकर ले जा रहा है, वह मालिक तो फूल को हाथ मे आने पर ही सूघ
सकेगा पर उसके पहले वह नौकर सुगन्ध को ले लेता है। वैसे ही हमारे
विचारो से सबसे पहले हम ही प्रभावित होते हे । यदि हमारे विचार अच्छे होगे
तो हमारा चैतन्य देव भी पवित्र रहेगा ओर हमारे विचार बुरे होगे तो हमारी
चेतना भी बुरी होगी।जिस प्रकार क्रोध करने वाला व्यक्ति जिस पर क्रोध कर रहा है, गुस्से
मे उवल कर अनर्गल बोल रहा है। वह व्यक्ति उस सामने वाले व्यक्ति के क्रो
[কী হাল भाव से सहन कर लेता हे तो उसका तो कुछ नहीं बिगडता, बल्कि
उसके तो शवित्त सचित होती है पर क्रोध करने वाले व्यक्ति की शारीरिकः,
मानसिक ओर आध्यासिक सभी तरफ से हानि होती हे।आज के युग मे मन की धारणाओ से होने वाले अनेक प्रयोग सामने
आ चुके हैं। वैज्ञानिको ने प्रत्यक्ष कर दिखला दिया है कि मन के प्रयोग से
कैसे विचित्र कार्य सघटित किये जा सकते हे | चेकोस्लावाकिया की राज
नी प्राह के अन्दर घटित वेतिस्लावकाफ्का का घटनाक्रम पढने को मिला
था। उसमे बतलाया गया है कि वह प्राह के बाहर बैठकर सकल्प करके वृक्ष
पर वैठे पक्षियो को नीचे गिराकर खत्म कर देता था। उसके इस प्रयोग को
देखने व जानने के लिए योरोप के लगभग 200 वैज्ञानिक उसके पास आये
थे] उन्हे देखकर बडा आश्चर्य हुआ था। खोजने पर ज्ञात हुआ कि वह
তরি अपनी सकल्प शक्ति से उन पक्षियो की प्राण ऊर्जा को खींच लेता
था] इस प्रकार उन्हे खत्म कर देता था] सकल्प शक्ति के एसे अनेक
परिणाम सामने आये है ।आगम के धरातल पर तो मन के विचारो का प्रमाव किस प्रकार पडता
है यह स्पष्ट ही है । प्रसन्नचद्र राजर्षि के विचाये द्वारा आने वाला उतार-चदढाव
इसका पुष्ट प्रमाण हे! तदुल मत्स्य दारा हिसक मनोवृत्ति से होने वाली
सातवीं नरक के ঘন কী रिथिति भी विचारो के परिणाम को स्पष्ट करती हे।
इसे प्रकार जब अशुभे विचार अपनी आत्मा को एव बाहरी आत्माओ को
प्रमावित करने मे इतने समर्थ हैं त्तो शुम विचार अपनी आत्मा को शुम रूप
मे प्रमावित करने मे कैसे नहीं समर्थ होगे ? अवश्य समर्थ होगे।
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