जिंदगी के बदलते रूप | Zindagi Ke Badlte Rup

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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जिन्दगी के बदलते रुप मेरीन ड्राइव से दौडती हुई मारुती कार थाना की ओर जा रही थी । कार तीत्र वेग से चली जा रही थी। परन्तु चेम्बूर के चौराहे पर लाल बत्ती जल जाने से तेजी से ब्रेक मारकर रोकते हुए किशोर ने सध्या से कहा- आज की सध्या तो थाना के तालाब मे डूबते सूरज के रमणीय रूप को देखते हुए नाव खेते-खेते बितानी है। सध्या का वह सुनहरा टाईम बडी ही सुखद अनुभूति कराने वाला होता है। हा-हा शादी से पहले एक बार मैं भाई महेश के साथ गई थी और उस तालाब मे नाव चलाई थी | लेकिन उस समय का आनन्द और था, और इस समय का मजा कुछ और ही आयेगा। सध्या की बात सुनकर किशोर ने कहा, “लेकिन ऐसा क्यो ? उस समय भी तो तालाब वही था, जो इस समय है। सध्या भी वही थी जो आज होगी। सब कुछ तो वही रहेगा। फिर आज का विशेष आनन्द कैसा ? जरा सकुूचाते हुए सध्या ने कहा-थोडा आप समझने की कोशिश करिये। मैं नहीं समझती कि आप मेरा ईशारा नहीं समझते, फिर भी जान-बूझकर मेरे से सब कुछ स्पष्ट कराना चाहते हँ तो सुनिये उस समय मेरे साथ भाई था- तब भ्रात-स्नेह प्राप्त था, पर आज मेरे साथ मेरे प्राणनाथ है, जीवन खवैया है, अत आज का आनन्द तो विचित्र प्रकार का होगा ही।




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