साहित्यको से | Sahitya ko Se

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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भूदान-यात्रा को आभत्रण : ३ : मे अपने को साहित्यिक नही मानता । वैसे साहित्यं कं लिए मेर मन में प्रेम हे, और परमेश्वर ने मुझे हिन्दुस्तान की सब भाषाओं के और प्राचीन भाषाओं क*साहित्य से पर्चिय प्राप्त करते का अवसर दिया हूं । मे यह तो नहीं कह सुकता कि मेने गहराई से अध्ययन किया हैं, परन्तु आत्म-संतोष क लिए मन अपना काम करते-करते कुछ अध्य- ঘন किया हुं, क्योकि मेरा जीवन कम-रत रहा हे । वेदों से लेकर आज तक का जो विचार-प्रवाह है, उससे शब्द के खयाल से नहीं, विचारों के खयाल से में परिचित हूँ। उस विचारधारा में जो अच्छाइयाँ हें, उनके प्रति मेरा प्रेम है । पश्चिम का साहित्य भी मेने देखा है । दो प्रकार का साहित्य मं साहित्यिक नही हूं । आपके सामनं यह्‌ व्याख्यान भी कायवश दे रहा हूँ | यह व्याख्यान कवल भहेतुक नहीं है, उसके पीछे हेतु है । संभव हु कि साहित्य हेतु-युक्त हो भी सकता हं और नहीं भी हो सकता हे । भगवद्गीता ने दो प्रकार के साहित्य का जिक्र किया हू । एक तो वह कि स्फूर्ति हुई और उनके मुख से सृक्तों द्वारा वेद प्रकट हुआ* और दूसरा वह साहित्य, जो हेतु-युक्‍त होता हू । साहित्यिक दवर्षि हें मेरा दावा साहित्यिक होने का नही हू, परन्तु मे जो बोलता हूँ, और करता हूँ, उसमें सदिच्छा और सद्भाव रहता हूं । इसलिए




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