रास और रासान्वयी काव्य | Ras Aur Rasanvayi Kavya

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Ras Aur Rasanvayi Kavya by डॉ. दशरथ ओझा - Dr. Dashrath Ojhaडॉ. दशरथ शर्मा - Dr. Dasharatha Sharma

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( ९ ) उन दोनों से ही अभिनय की सामग्री लेकर जनरंजन के रूपों का निर्माण फिया जाता है। भरत ने स्वयं इन' दो धार्मियों फी परिभाषा फो और स्पष्ट किया है-- े धर्मी या द्विविधा प्रोक्ता मया ভুত डिजोत्तमाः। लौकिकी नाथ्यधर्मी च तयोवेक्ष्यामि लक्षणम्‌ ॥ ७० स्वभावभावोपगतं शुद्धं तु विकृतं तथा। लोकवाता क्रियोपेतमङ्गलीला विवर्जितम्‌ ॥७१ स्वभावाभिनयोपेतं नानास्त्रीपुरुषाश्रयम । यदीदर्श भवेन्नाथ्यं लोकधर्मी तु खा स्घखता ॥७२ ( नाव्यशासतत्र, अ० ६ ) श्र्थात्‌ लोकधर्मी श्रमिनय वे हैं जिनका आधार लोकवातता अर्थात्‌ लोक में प्रसिद्ध क्रिया या दचान्त होता है, जिसमें स्थायी - व्यभिचारी आदि भाव ठेठ मानवी स्वभाव से लिए जाते हैं ( कविकृत श्रति- रंजनाओं से नहीं) ओर नेक सरी-पुखुष मिलकर जिसमें बिल्कुल, स्वाभाविक रीति, से अमिनय करते हैं; अर्थात्‌ उठना; गिरना, लड़ना; चिल्लाना, मारना आदि की क्रियाश्रों को असली जीवन की अनुकृति के अनुसार करते हैं, अभिनय की बारीकियों के अनुसार नहीं | यहाँ मरत का आग्रह लोकवार्ता ओर लोकामिनय के उन रूपों पर है जिन्हें फविक्ृत सुसंस्कृत नाथ्य रूप प्राप्त न हुआ हो । यदि फोई अभिनय पिछुला रूप ग्रहण कर ले तो उसका वह उच्च धरातल नास्य धर्मी कदा जाता था | इस विवरण की पृष्ठ भूमि में अपने यहाँ के रूपक ओर उप रूपक के नाना भेदों को समझा जा सकता है। लोकधर्मी अमिनयो फा नाव्यघर्मी, में परिवतंन चाहे जच्र संभव हो सकता था। इस दृष्टिकोण से जब्न आरचार्यों को अभिनयात्मक मनोरंजन के प्रकारों का वर्गीकरण फरना पड़ा तो उन्दने कुछ को रूपक ओर शेष फो उपरूपक फटा । रूपक वे थे जिनका नाय्यात्मक स्वरूप सुस्पष्ट निर्धारित हो चुका था; जिनमें वाचिक, आगिक, आहार्य ओर सात्विक अभिनय फी. बारीकियाँ विकसित हो गईं थीं, और न्यायतः जिन्हें उच्च सास्कृतिक या नागरिक धरातल पर काव्य और अमिनय के लिये स्वीकार किया जा सक्ता था । आचार्यों ने नाटक, प्रफरण, डिस, ईइंहासग समवकार, प्ररखन, व्यायोगः, माणं, वीथी; श्रंक को रूपक मान लिया ।




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