गीता प्रवचन | Geeta Parvachan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्रास्ताविक आख्यायिका : अर्जुनका विषाद १५ ३. गीताको प्रयोजन : स्वधर्म-विरोधी मोहुका निरसन ११, अर्जुन अहिसाकी ही नहीं, संन्यासकी भी भाषा वोलने खगा । वह्‌ कहता ह-“इस रक्‍्त-लांछित क्षात्र-धर्मसे संन्यास ही अच्छा है ।” परन्तु क्या वह अर्जुनका स्वधर्म था ? उसकी वह वृत्ति थी व्या ? अर्जुनं सन्यासीका वेष तौ वड़े मजेमें वना सकता था, पर वसी वृत्ति कैसे छा सकता था ? संन्यासके नामपर यदि वहु जेगलमें जाकर रहता, तो वहाँ हिरन मारना शुरू कर देता 1 अतः भगवानेने साफ ही कहा-“अर्जुन, जो तू यह कह रहा हैं कि मं लडंगा नही, वह्‌ तेस अम हैं। आजतक जो तेरा स्वभार्व बना हुआ हैं, वह तुझे लड़ाये बिना रहेगा नहीं!” अर्जुनको स्वधमं विगुण मालूम होने लगा । परन्तु स्वधर्मं कितना ही विगुण हो, तो भी उसीमें रहकर मनुष्यको अपना विकास कर लेना चाहिए; क्योकि उसमे रहनेसे ही विकास हौ सकता है । इसमें अभिमानका कोई प्रन नहीं ह । यह्‌ तो विकासका ঝুল हु । स्वधर्मं ऐसी वस्तु नहीं हैं कि जिसे बड़ा समझकर ग्रहण करें और छोटा समझ- कर छोड़ दें । वस्तुत: वह न बड़ा होता है, न छोटा । वह हमारे नापका होता है। भेयान्‌ स्वघर्मो विगुणः इस गीता-वचनमे ভন शब्दका अर्थ हिन्दू-धर्म, इसलाम-धर्म, ईसाई-घर्म आदि जैसा नहीं हैं । प्रत्येक व्यक्तिका अपना भिन्न-भिन्न धर्म हैं। मेरे सामने यहाँ जो दो सौ व्यक्ति मौजूद हैं, उनके दो सौ धर्म हें । मेरा भी धर्म जो दस वर्ष पहलेथा, वहआज्‌ नहीं है । आजका धर्म दसवर्ष बाद टिकेगा नहीं। चितन ओर अनुभवसे जसे-जसे वृत्तियां बदलती जाती हु, वेसे-वर्से पहुलेका धर्म छुटता जाता और नवीन धमं प्राप्त होता जाता है । हठ पकड़कर कुछ भी नहीं करना है । है ए ২০. दूसरेका धर्म भले ही श्रेष्ठ मालूम हो, उसे ग्रहण करनेमें मेरा कल्याण नहीं है । सूर्यका प्रकाश मुझे प्रिय हु। उस प्रकाशसे में बढ़ता रहता हूँ। सूर्य मेरे लिए वंदतीय भी हैँ। परन्तु इसलिए यदि मैं पृथ्वीपर रहना छोड़कर उसके पास जाना चाहूँगा, तो जलकर




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